Saturday, December 26, 2015

एक ख़्वाहिश

काश ! पलट जाती बाजी शतरंज की
और तक़दीर के मोहरों ने चल दी होती
एक शातिर चाल
हम भी जीत जाते एक पाक रूह
और बिछा देते प्रेम के धरातल पर
दिल की बिसात
मगर क्या करें ? कुछ मुकद्दर था गद्दार
कुछ कमी थी भेजे में
भाँप ही नहीं पाये हक़ीक़त के मोहरे
और फ़ना हो गयीं खुशियाँ
शह और मात के चक्रव्यूह में फंसकर
बहुत आसानी से घिर गया
गलत पाले में फड़फड़ाता वज़ूद
अब किसके कानों में पिघलाएं लावा
सब हैं स्वार्थ-प्रदूषण के शिकार
कोई किसी के दर्द में होकर शुमार
खोना नहीं चाहता अपना ऐतबार
सच की आँखों में बाँधकर पट्टी
देखना चाहते हैं सभी सतरंगी इन्द्रधनुष
और सेंकना चाहते हैं सुनहरी धूप
उगते सूर्य को देकर अर्ध्य मतलबखोरी का
डूबते सूर्य से पीछा छुड़ाना चाहते हैं सब
क्योंकि यह मतलब से बुना संसार है
यहाँ भावनाओं को पिरोना बिल्कुल बेकार है
यहाँ भावनाओं को पिरोना.............................................|                        

Thursday, December 17, 2015

हालात का मिलन

तमन्नाओं की झंकार खो गयी है
तन्हाई की भूल-भुलैया में
मुस्कुराहटों की रफ़्तार थम गयी है
उदासी की नैन-लड़ैया में
अश्क़ हमसे मिल ही लेते हैं गले
गम की मौज-मड़ैया में
पीकर प्याला दर्द का थिरकते है जख्म
मायूसियों की नाच-नचैया में
लगाकर बाज़ी फरेब की जीत ही लेते है दिल
वो नैनों के खेल-खिलैया में
खिल ही जाते है कँवल उनकी यादों के
दिले-हूक की ताल-तलैया में
भिगोकर अहसास सोख लेते हैं जाँ
वो वादों की रास-रसैया में
लम्हा-लम्हा बिखर जाते है ख्वाव
गुरूर की हठ-हठैया में
गटककर रुसवाई डूब गए हम
चाहत की राम-रमैया में
          

Monday, December 14, 2015

ये तुमने क्या किया

बनाकर वज़ूद शीशे का
पत्थरों में लाकर छाोड दिया
देकर एक पंख परिंदे का
पिंजरे में लाकर छोड़ दिया
आह को भींचकर बेबसी में
मुस्कुराने को छोड़ दिया
सौंपकर तड़प का दरिया                                                                                      
तन्हा कश्ती में लाकर छोड़ दिया
गुरूरी जंजीर से बांधकर रूह को
आस पिघलाने को छोड़ दिया
स्याह रात से लिखकर तक़दीर
लौ टिमटिमाने को छोड़ दिया
भेदकर एक तीर तिरस्कार का
सर झुकाने को छोड़ दिया
देकर उपनाम वंश-बेल का
रेगिस्तान में लाकर छोड़ दिया
तराशकर दिले ऐतबार
बुत बनाकर छोड़ दिया
जलाकर चिता एक याद की
राख बनाकर छोड़ दिया
पिरोकर रिश्तों के मोती
गैर बनाकर छोड़ दिया
ऐ,कश्ती के खिवैया ये तुमने क्या किया

Saturday, December 5, 2015

कतरा -कतरा ख़ुशी

गर रोशनी न छिटके आफ़ताब की
हम गर्दिशी-अंधेरों में समा जायें
गर आंच न तापें जज्बात की
हम तन्हा ही ठिठुर जायें
चन्द पल जो गुजार आते हैं
दोस्तों के साथ
उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ने को मिल जाता है
इक सीढ़ी का साथ
गर इन्तजार न हो डूबते चाँद का
हम धूप से खिली चाँदनी में फिर कैसे नहायें
बनाकर सिरहाना
सुनहरे पल की कपास का
टिका देते है सारे गम
बोझिल पलकों से
गर रात न सुनाये तराना निःश्चल प्रेम का
हम ख़्वाबों के छल्ले फिर कैसे उड़ायें
अश्कों के समुन्दर में
फ़रियाद की छाँव तले
लो आके बैठ गये हम
मायूसियों को ढांपकर
ठंडी रेत के आगोश तले
गर पवन न दे पाये अपनियत का किनारा
हम डूबते दिल को फिर कैसे बचायें
दिल के तहखाने में समेटकर
बिखरी यादों के पन्नें
भटक जाते हैं
अल्हड़ बचपन की गलियों में
गर खोल न पाये ख़ुशी उदासी की साँकड़
हम लुप्त हुये अलंकार में मोती कैसे सजायें     

Tuesday, November 10, 2015

दिल की दीवाली

अंधेरों से उजालों में जाने के लिये
ऐ मन थम जा, इक मुलाकात दिये से कराने के लिये
नफरतों का मंजर वजूद से मिटाने के लिये
ऐ मन थम जा, रोशनियाँ जगमगाने के लिये
राग और द्वेष की कटुता भुलाने के लिये
ऐ मन थम जा, फुलझड़ियाँ जलाने के लिये
दिलों की कड़वाहट रिश्तों तक न लाने के लिये
ऐ मन थम जा,  खुशबुएँ बिखराने के लिये
हौसलों की उड़ान आसमां तक पहुँचाने के लिये
ऐ मन थम जा, राकेट छुड़ाने के लिये
सच्चाई का प्रकाश हृदय पर फैलाने के लिये
ऐ मन थम जा अँधेरे सिकुड़ाने के लिये
एक पैबंद उधड़ी आस पर लगाने के लिए
ऐ मन थम जा, उम्मीद का चाँद बुन जाने के लिये
अरमानों की रंगोली सजाने के लिये
ऐ मन थम जा, जीवन में उमंग घुल जाने के लिए
मुश्किल हालात में खुद को आजमाने के लिये
ऐ मन थम जा, एक बाजी जिताने के लिये
रूठे सनम को मनाने के लिये
ऐ मन थम जा, चिनगारियाँ भड़काने के लिये

Monday, November 2, 2015

उग रहा है बदलाव

फूट  रहीं हैं बालियाँ
लहलहा रहे हैं  कोपल                                                             
भीग रहा है धरा का आँचल
गर्वित बौछार से
फैल रही हैं व्यक्तित्व की किरणें 
हौसले के अंगार से
इतिहास की नीँव, पुरानी हो रही है
बेटियाँ  सयानी हो रही हैं
गढ़ रहे हैं नये आयाम
बेचारगी के मर्तबान से
छिटक रहा है नीर बदलाव का
चीर अम्बर  का सीना
तरक्की की रफ़्तार से
आँगन की खूंटी, भूली-बिसरी कहानी हो रही है
बेटियाँ सयानी हो रही हैं
फोड़कर  रूढ़ियों की चट्टानें
बीन रही हैं रास्ते
महका रही हैं नव-जागृति की खुशबू
अजन्मी कलियों तुम्हारे वास्ते
फैसलों के अधिकार पर, एक उंगली जनानी हो रही है
बेटियाँ सयानी हो रही हैं
बाँधकर केशों से बाँध
बहा रही हैं एक नवीन सृजनता की पहचान
उतारकर लोहे को ममता के दूध में
खोद रही हैं एक नया समाज
अस्तित्व के सम्मान में 
बोझ हैं कांधे का, यह सोच शर्म से पानी-पानी हो रही है
बेटियाँ सयानी हो रही हैं
                                                           
                                                    

                                  





         







Sunday, October 25, 2015

यादों का सफर

जज़्बात की आंधी सूखे पत्तों को
महका जाती है 
बीते लम्हों की कसक जब
पलकों पर छलक आती है
यादों की थाम उंगली बेचैन रूह
टूटे खण्डहर में समां जाती है           
गुजरे लम्हों की दास्तां यादों के पन्ने
पलट जाती है
जिंदगी की किताब जब अलमारी से
निकल आती है
बजाते ही सोच का साज चुपके-चुपके
अल्हड़-शोख़ शरारतों की वीणा
पत्थर जिस्म को हरक़त की हंसी
दे जाती है
हृदय-पटल के तबले पर जब यादों की थाप
पड़ जाती है
जो छूट गया वो साथ,जो बीत गया वो पल
जो बिखर गए वो मोती,जो तन्हा रह गया वो वज़ूद
ख़ामोश रूह तन्हा ही सफर उन गलियारों का
कर आती है
कुछ अधूरे ख़्वाब,कुछ अनकही फ़रियाद
कुछ ढके-मुदे राज,कुछ खुशनुमा अहसास
सबको यादों की कश्ती में कर सवार
उम्र की लहरें वक़्त के समुन्दर में
गोतें लगा आती हैं  
दूरियों के भंवर में जब मिलन की झंकार
कसमसाती है    
एक टीस तड़प के पोरों से नस-नस में
पिघल जाती है
बीते लम्हों की कसक जब पलकों पर
छलक आती है  

Wednesday, October 21, 2015

इंसाफ की पुकार

इक डली हकीक़त की जो तूने
चख ली होती
ता-उम्र मोहब्बत की फिर
यूँ आज़माइश न होती

एक पन्ना एतबार का जो तूने
पढ़ लिया होता
फरेब की स्याही से फिर
यूँ हथेली रंगवाई न होती

एक चाँद वफ़ा का जो तूने
गटक लिया होता
कतरा-कतरा चाँदनी फिर
यूँ बहाई न होती

एक ख्वाब चाहत का जो तूने
बुन लिया होता
सर्द रातों की तन्हाई फिर
यूँ ठिठुराई न होती

एक हठ गुरूर का जो तूने
तोड़ दिया होता
रिश्तों की नीव फिर
यूँ लड़खड़ाई न होती

एक कँवल सच का जो तूने
खिला दिया होता
झूठ से हर शाम फिर
यूँ मुरझाई न होती

एक पिंजरा तंगदिली का जो तूने
खोल दिया होता
रूह,रूह से लिपटने को फिर
यूँ फ़ड़फ़ड़ाई न होती

एक अंगार हौंसले का जो तूने
छू लिया होता
मोहब्बत की सरेराह फिर
यूँ रुसवाई न होती

लिफ़ाफ़ा देखकर मज़मून जो तूने
भाँप लिया होता
दम तोड़ती मोहब्बत की फिर
यूँ राख उड़ाई न होती  

एक फैंसला दिल से जो तूने
चुन लिया होता
इंसाफ की चौखट पर फिर
यूँ जीत लजायी न होती

नादान मोहब्बत को जो तूने
अपना लिया होता
शम्माये इश्क़ की लौ फिर
यूँ बुझायी न होती      

Wednesday, October 14, 2015

क़ुबूल करते हैं

ग़म की चाशनी में लिपटे हुए लम्हों
हम तुम्हारा सलाम क़ुबूल करते हैं
वो मुकर गए हैं अपने वादों से तो क्या
हम एक क़तरा उम्मीद क़ुबूल करते हैं
मत कहो उनको बेवफ़ा ऐ ज़माने वालों
हम उनका ये तोहफा भी क़ुबूल करते हैं
वो दे न पाये एक रात चांदनी की तो क्या
हम चाँद अमावस का क़ुबूल करते हैं
जिस्म के भँवर में खोकर क्या होगा हासिल
हम रूहे किनारा क़ुबूल करते हैं
तुम महफ़िलों के आकाश में खुलकर उड़ो
हम तन्हाइयों का पिंजरा क़ुबूल करते हैं
फ़कत हक़ जो जमाये वो मोहब्बत हो नहीं सकती
हम दिल से यह हक़ीकत क़ुबूल करते हैं
तुम दूर रहकर गर मेरे साये से लिपट जाओ
ता-उम्र हम यह फ़ासला  क़ुबूल करते हैं
महफ़िल में इनकार तन्हाई में इकरार
हम तेरी ये अदा भी क़ुबूल करते हैं
पड़ने लगे हैं छींटे अब पाक दामन पर
हम रुसवाइयों के दाग क़ुबूल करते हैं
इक शोला भड़के और मैं राख हो जाऊँ
हम तेरी ये चाहत भी क़ुबूल करते हैं
तुम उतारते रहो खंजर मासूम मोहब्बत पर
हम सर झुकाकर जुर्म-ऐ-वफ़ा क़ुबूल करते है
तुम जीतते रहो बाज़ी वज़ूद के पलटवार की
हम जीत की हार क़ुबूल करते हैं
वो साज़ ही क्या जिसमें सुर-ताल न हो
हम जफ़ा की झंकार क़ुबूल करते हैं
वो इश्क़ ही क्या जो रहमो-करम को तरसे
हम जहाँ की ललकार क़ुबूल करते हैं
टांक ही लेंगे सितारे दामन में एक रोज़
हम ज़ि-दे-वफ़ा क़ुबूल करते हैं
                                                                                                                                             






























                                                                                                                 






Wednesday, October 7, 2015

टूटा दिल

वो मिल भी जाये तो क्या
बिछुड़ना तो फिर भी होगा
अब ये अलग बात है कि
कोई पहले कोई बाद में रुखसत होगा

घिस-घिस कर नफरत को उसने
एक बारूद बना दिया
ये भी न सोचा कि इससे
आशियाँ उसका ही राख होगा

बांट-जोहते बहारों की
बहुत दूर चले आये हम
मुड़कर देखा तो पाया
उजड़ चुका जो चमन वो
फिर न गुलजार होगा

समां चुकी है जो रूह तक
उसकी बेवफाई की खुशबू
कितना भी छिड़क ले
अब इत्र बेगुनाही का वो
सूँघने वालों को अब न कोई एतबार होगा 

बहुत लुफ्त आता है किसी के
दिल को देके दर्द-औ-तड़प
मगर कभी ये सोचा नहीं
जो लुढ़क आया है उसके गालों पर
वो भी तो अश्क तुम्हारा होगा

जला के हसरतें दफ़ना के जज्बात
मिटा के मोहब्बत लुटा के खुशियाँ
लो आके बैठ गये पहलू  में वो
पल भर भी उन्हें यह एहसास नहीं
बुझी राख में अब न कोई अंगार होगा

फ़ना हो जायेगे हम उनकी बेरुखी से या रब
ख़ौफ-जदा होता है दिल मगर ये सोचकर
जब होगा हक़ीकत से उनका सामना    
वो खुद अपने वजूद पर शर्मसार होगा

बार-बार चोट लगने से
पत्थर भी फ़ना हो जाता है
ये तो इक दिल है टूटकर इसमें
फिर न किसी मूरत का बसेरा होगा

रुसवा हुई मायूस धड़कनों
यूँ दिल दुखाने से न कुछ हांसिल होगा
जो फिसल गया है तकदीर के हाथों से
वो मुकद्दर न तुम्हारा होगा

चाँद ने समझा है दर्द
तन्हाइयों ने टटोली है नब्ज़
टूटते तारों से आयी है सदा
दम तोड़ चुकी मोहब्बत का
अब न जनम दोबारा होगा         

Thursday, October 1, 2015

एक युग बदलाव का

अल्हड़ प्रेम से झुकी डाली
प्यार-मनुहार से हठ कर
चूमती है धरा का मस्तक
और मांगती है आशीष
एक वादे के एतबार पर
अर्पण करने को तन-मन
सहेज कर रखा जो मैंने
फ़न उठाये बवंडर से संभाल कर
टूटने न दिया जिस विश्वास को
आज हर्षित महसूस कर रही हूँ
उसको न्योछावर कर प्रेम-पर
मेरे मन का माली तोड़कर ले जाएगा
मेरी डाली से अमृत-फल
और तृप्त करेगा आत्मा
मूक-प्रशंसा से चखकर
समां लेगा रूप का रस
अपने हृदय के भीतर
और गायेगा गीत बहारों के
खुशी से झूमकर
मगर मुझको ये गुमान न था
छोड़ देगा साथ मेरा वो
समाज के शिकंजे में कसकर
और कुरीतियों की भेंट चढ़ जाएगा
एक और असहाय बीज
समाज से आहत होकर
ऐ धरा ! मुझको है पता
क्षमाकर, मेरी इस भूल को
तू बड़ी सरलता से समाएगी
उस समाज से तिरस्कृत बीज को
अपने भीतर
इंसानियत के प्रकाश से सींचकर
लहलहाएगी एक और पौधा अपनत्व का
कीचड़  में सनकर भी जो
कमल बनकर खिलेगा
रूप-गुण की खान से जो इस संसार को
गर्वित करेगा
किसी जाति-धर्म के बंधन में जो न बंधेगा
पाठ पढ़ाकर समानता का जो सर उठाये
आकाश को गर्व से छुयेगा
किसी नदी-नाले,तालाब में जो न बहेगा
रात की कालिख से बनाकर स्याही तकदीर की जो
अपनी गाथा स्वयं गढ़ेगा
मुझको है विश्वास एक ऐसा सूर्य
इक्कीसवीं-सदी में जरूर उगेगा
माँ की असहायता  और बाप की कायरता का दण्ड
जिसको न मिलेगा
जिसके स्वाभिमान से ऊँच-नीच,अमीर-गरीब,
जाति-धर्म का पत्थर अवश्य पिघलेगा
और समानता का जुनून बनकर वो लावा              
किसी आरक्षण को फिर न तकेगा
उम्मीद से भरी आँखों को है आस कि इन      
भविष्य की धरोहरों को एक युग बदलाव का
जरूर मिलेगा   
एक युग बदलाव का.. .... …… ....

Thursday, September 17, 2015

बहुत अहसान किये हैं तुमने

सांसे कैद करके खुदगर्जी के पिंजरे में
तुम कहते हो उन्मुक्त उड़ान के पंख
दिए हैं तुम्हे
जिन्दा दफ़न करके इस मिट्टी की काया को
भावनाओं के रेगिस्तान में
तुम कहते हो खुला आकाश निहारने को स्वप्न
दिए हैं  तुम्हे
अतृप्त अभिलाषाओं को सीने से बाहर
झाँकने भी नहीं देते
प्रकाश का एक पुंज हृदय के धरातल पर
प्रज्जवलितं होने भी नहीं देते
कहते हो सुनहरी मांग सजाने को
तेजस्वी पुंज दिए हैं तुम्हे
नाम देकर एक शक्ति का मुझको
बेबस और लाचारी की कुटिया में बैठाकर
नैतिकता और धर्म का पाठ पढ़ाकर
खींचकर लक्ष्मण-रेखा का आश्रय
तुम कहते हो कस्तूरी- मृग
दिए है तुम्हे
स्वर्ग और पृथ्वी के बीच संपूर्ण आकाश है तुम्हारा
दम्भ-मान से अधिभूत इस बलशाली काया का
समाज गुलाम है तुम्हारा
दो बूँद चाहत से व्याकुल इस लचकती डाली में
ममता का फूल खिलाकर
झुकी-सहमी, थरथराती  पहचान थमाकर
तुम कहते हो लहलहाने को वायु के भण्डार
दिए हैं तुम्हे            

Saturday, September 12, 2015

काश ऐसा हो जाए

भूला -भटका एक चाहत का पल
कहीं से खाली तमन्नाओं की झोली में
चुपके से आ  जाये
हर्षित घुंघरूओं  की झंकार
उदास नीरस -जीवन को
फिरकनी सा नचा जाए
सतरंगी बहार से महक जाए
दुखी आँचल
ख़ुशियों के श्रृंगार से लरज जाए
मदमस्त यौवन
नेह की बौछार से भीग जाए
द्रवित तन-मन
बादलों के पार पहुँच जाए
मूक-समर्पण
टूटकर बिखर जाए अहम में
पिरोया वज़ूद
तुम्हारे भीतर खो जाए
ये देह ये  रूप
खामोश हो जायें  ये लब
खामोश हो जाए ये हठ
उठाकर रख दूं मैं  भी नाज़-गुमान
एक कोने में
उठाकर रख दो तुम भी अहंकार-दौलत
एक कोने  में
मैं भी खाली, तुम भी खाली
बस एक चाहत की कशिश
दोनों के दिलों की तिजोरी
भर जाए
बेनूर तन्हाई की रातों को
खिलखिलाती चाँदनी से
नहला जाय्रे   
काश एक भूला-भटका चाहत का पल
कहीं  से आ जाए    
स्याह-सफ़ेद मायूसियों के पन्नों को
रंगीन लम्हों से सजा जाए
काश...............................


















Friday, September 11, 2015

बुझी राख

थक गयी हूँ बहुत 
ख़ुद की आज़माइश करते-करते
भावना-हीन वृक्ष की जड़ों
को अश्क़ों से सींचते-सीचते
बहुत दूर् निकल आयी हूँ
एक रिश्ता निभाते-निभाते
इक जिस्म घसीट लायी हूँ
इक दाग छुपाते-छुपाते
चुक  गयी हूँ  बहुत 
एक डर पालते-पालते 
टूट गयी हूँ  बहुत 
एक पहचान सँभालते-सँभालते   
रह गया है बस एक रीतापन 
बचा खजाना खंगालते-खंगालते 
गुम  हो गया है वजूद
खुद को तलाशते-तलाशते 
खुश्क हो गयी है रूह 
एक  बूँद चाहत मांगते-मांगते
सुर्ख हो गई  हैं  हथेलियाँ 
खौलता गुबार  ढांपते -ढांपते  
धुंधली  पड़ गयी है नज़र
भविष्य  का मज़्मून भांपते-भांपते 
पथरा गयी है आँखे 
वफ़ा  का एक पल ताकते-ताकते 
ज़ख़्मी हो गया है विश्वास 
जफ़ा का नासूर  सालते-सालते 
कट गयी है उम्र 
दिलों से कांटे बुहारते-बुहारते 
लड़खड़ा गया है हौसला 
पत्थर-दिल बुत को तराशते-तराशते 
फिसल गयी है रेत  खुशियों की 
बस इक नाम उकारते -उकारते

   
                                                                                                                          

Tuesday, September 8, 2015

बस कुछ वक्त और

बस कुछ वक्त और
वक्त की उंगली थाम
सांसारिक भूल-भुलैया के चक्रव्यूह में
भटकते रहना है
फ़र्ज़ की दहलीज़ पर
कर्तव्य की लाठी टेक
उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते रहना है
बस कुछ वक्त और.............
कुछ ख्वाहिशों से सजाकर
एक छोटा सा नीड़
कुछ मिट्‍टी के सकोरों में
स्नेह से उड़ेलकर
उज्ज्वल भविष्य के
सपनों का नीर
बूँद-बूँद एहसास को
घूँट-घूँट गटकते रहना है
बस कुछ वक्त और........................
रास्ते के पत्थरों को
बुहारकर
चट्टानों के बीच से एक दरिया
निकालकर
मंज़िल को लगन से
तराशकर
अविरल बहती शांत नदी से
प्रेरणा माँगकर
सांसो को जीवन के मोती की माला में
पिरोते रहना है
बस कुछ वक्त और................
कुछ यादें गुजरे पलों की
बगिया से सींचकर
कुछ पुराने ख़त दिल के
तहखाने से ढूँढकर
कुछ ख्वाब रेत के दामन
में उकेरकर
चाँदनी रात का उजाला विचलित मन के
पोरों में भरते रहना है
बस कुछ वक्त और....................
आत्म-बल की शक्ति से
मुश्किलों को जीतकर
क्षमा के दान से आत्मा को
खंगालकर
संतोष और धैर्य से
रिश्तों को सँवारकर
इस तुच्छ-देह को इन अमूल्य गुणों से
अलंकृत करते रहना है
बस कुछ वक्त और.........................
संकल्पित ताप से इस देह को
तपाकर
यश की बौछार से प्रियजनों
को भिगाकर
गुमनाम भीड़ में एक अलग
पहचान बनाकर
अमृत और मृत्यु के स्वाद को
चखते रहना है
बस कुछ वक्त और.......................



   

Monday, August 31, 2015

एक सलामी हाकी के "जादूगर मेजर ध्यान चंद" मेरे नानाजी को

बुंदेले हरबोलों की धरती पर गूँजी
एक खेल प्रेमी की गर्वीली जवानी थी
बस इक हॉकी की छड़ी से उसने
फिरंगियों के छक्के छुड़ाने की ठानी थी

न तीर न तलवार,न गोलियों की बौछार से
फिरंगियों को धूल चटाई उसने
बस हॉकी की ललकार से

ध्यान सिंह था नाम उसका
गंगा की पावन भूमि  इलाहाबाद था
जन्म निवास उसका

२९ अगस्त सन१९०५ को ब्रह्माण्ड से
एक तारा जमीं पर उतर आया था
मूल सिंह व रूप सिंह दो भाइयों के बीच
जिसने अपना स्थान पाया था

रानी लक्ष्मीबाई वीरांगना की धरती पर
उसका परिवार बस आया था
झाँसी के फीरोज मैदान की चरण-धूलि
का तिलक जिसने अपने माथे पर लगाया था

इक लकड़ी के डंडे से उसने क्या
कमाल कर दिखाया था
हिटलर जैसे तानाशाह का भी सर
उसने अपने कदमों पर झुकाया था

उसके हाथ पर पहुँच कर हॉकी
कृष्ण की मुरली बन जाती थी
गेंद तो जैसे गोपियाँ थी
जो रास उसके संग रचाती थी

पलक झपक भी न पाए तब तक
गेद गोल तक पहुँच जाती थी
भरे हुए मैदान को तालियों से
गुंजायमान कर जाती थी

तीन ओलम्पिक जीत उसने
ब्रिटिश के सीने पर बिगुल बजायी थी
स्वर्ण अक्षरों में लिखकर भारत की जीत
इतिहास में दर्ज करायी थी

हिटलर जैसे तानाशाह ने तब उसकी
हॉकी  की जांच करायी थी
जूतों में है जादू इसके यह कहकर
उसके खेल पर संदेह की मुहर लगायी थी

पैरों से ठोकर मार जूतों को उसने
नई हॉकी के साथ नंगे पाँव ही
जर्मनी का सिंहासन  हिला दिया
एतिहासिक विजय हासिल कर
हिन्दुस्तानी साहस का दंभ दिखा दिया

तब हिटलर ने जर्मनी की नागरिकता
और सेना में फील्ड मार्शल
का ओहदा देने का हुक्म सुना दिया
मगर उस जाँबाज़ खेल के सिपाही ने
देश से गद्दारी का प्रस्ताव
तुरंत ही ठुकरा दिया
और भारत माता के दूध का कर्ज़ अदा किया

सेना में लांस-नायक की मामूली सी
तनख्वाह पर वह परिवार का
भरण-पोषण करता था
मगर हॉकी  के सम्मान को वह
फांको में भी बचाकर रखता था

पूरे खेल के जीवन में उसने
एक हज़ार से भी ज्यादा गोलों
का तोहफा संसार को दिया
और हॉकी  के खेल को उसने
जन-जन के हृदय में बसा दिया

3 दिसंबर सन् 1979 को फिर इस
महान हस्ती ने हॉकी  के भविष्य की
चिंता आँखों में लिए इस संसार से कूंच किया

इस कथा को सुनकर जवान खून तुम
हॉकी  के निर्माण कर्ता पर नाज़ करो

जिस खिलाड़ी के आगे ब्रिटिश ताकत
तक ने शीश झुकाया था
लोभ,मोह-सत्ता,ऊँचा ओहदा,देश-द्रोह
की जंजीरों में जो कभी जकड़ न पाया था

कठोर तपस्या से बॉल  को हॉकी  से चिपकाकर
जो 'हॉकी  का जादूगर' कहलाया था
और ध्यान सिंह से 'ध्यान चंद' उपनाम पाकर
जो चाँद को जमी पर उतार लाया था

ऐसे महान खिलाड़ी की धुंधली हो
चुकी तस्वीर की धूल तुम्हारी आँखों
से हटानी थी इसलिए ये कथा सुनानी थी
इसलिये ये कथा सुनानी थी -------





Friday, August 21, 2015

विदाई की रीत

जो अठखेलियाँ करती थी कभी
विस्तृत आकाश में
स्वप्न सजीले बुनती थी कभी
तारों की छाँव में
लुका- छुपी खेलती थी कभी
काली-घनी बदलियों के साम्राज्य में
गरजता बादल भी कभी जिसकी मोहक मुस्कान से
पिघल जाया करता था
सूरज का तेज़ भी कभी जिसके आगे फीका
पड़ जाया करता था
ठंडी पुरवाई जिसकी जुल्फें
संवारा करती थी
चंदा की चांदनी भी जिसका
रूप निहारा करती थी
आज सावन में भीगे गीतों के साथ
हो रही है उसकी विदाई
हाय ! रे विधाता, ये क्या रीत तुमने बनाई
अम्बर की रानी मिट्टी से उपजे राजमहल में
बसने को आई
एक थरथराता पत्ता क्या संभाल पायेगा
उसका अस्तित्व
या मिट्टी में मिल जायेगा कुंवारे सपनों
का संगीत
इतनी गहरी हो चुकी जड़ों का परिवेश
उस पत्ते से छूट न पायेगा
तब उस बूँद का अस्तित्व ही अपनी
पहचान खो जायेगा
उसकी उन्मुक्त-खनकती हंसी का बोझ
ये विशाल पुरातन-वृक्ष न उठा पायेगा
बांधकर उसको हजारों रीति-रिवाज़ों
की बेलों से
सांस लेने का अधिकार भी उससे
छिन जायेगा
उनकी इच्छाओं के बोझ-तले रूप का
कमल कुम्हला जायेगा
दम तोड़ती हसरतों की नदिया को
समुन्दर का वेग पी जायेगा
काली- घटा का नीर भी मन की उदासी को
न धो पायेगा
तालाब का मालिक भी याचना से निहारते
शुष्क अधरों को इक बूँद अमृत-सुधा की
 न दे पायेगा
रूढ़ियों का इतिहास धुरी का चक्र न बदल पाया है
न बदल पायेगा
पथराई आँखों को समानता का अधिकार अभी और
इंतज़ार करवाएगा
परिवर्तन का देवता अभी और बलि चढ़वाएगा
परिवर्तन का देवता ..................................
 

   
                    

Friday, August 14, 2015

संकुचित मन

अम्बर से उठाकर बदली का एक टुकड़ा
तुम दे नहीं सकते
चूमकर नैनों के कोरों से
भीगे हुए अहसास का एक क़तरा
तुम दे नहीं सकते
आँखों मे  छुपाकर बीते लम्हों का अँधेरा
भोर की किरनों से नहायी
अतीत की एक पँखुड़ी का सवेरा
तुम दे नहीं सकते
राग-द्वेष की कलाकृतियाँ मिटाकर ह्रदय से
स्नेह के रंगों में डूबा
आत्मीयता का एक कैनवास
तुम दे नहीं सकते
निश्चल-प्रेम से निहारती एक निरीह बूँद को
समर्पण के आलिंगन में जकड़कर
मोती बनाने का वैभव
तुम दे नहीं सकते
संशय-रहित विश्वास से ह्रदय के तारों को
छेड़कर इक नवीन-मधुर धुन का संगीत
भविष्य की धड़कनों को
तुम दे नहीं सकते
टूटते तारों से माँगा हुआ सात- जन्मों का साथ
हवन-कुण्ड की राख से भरकर मांग का उल्लास
चुटकी भर विश्वास का अहसास
तुम दे नहीं सकते
पल-पल बिखरते-झरते हरसिंगार के पल
बीनकर दामन में सहेजकर महकती खुशबुओं से
प्रफुल्लित होकर
दो घड़ी चैन से साँसों को गिनने का मधुमास
तुम दे नहीं सकते
एक थपकी मनुहार की एक समर्पण प्रेम का
एक कशिश चाहत की बस एक पुकार मेरे नाम की
एक ख्वाहिश तुम्हारी आँखों से चाँद  गटकने की
इन अतृप्त अभिलाषाओं का एतबार
तुम दे नहीं सकते
रेशमी धागों से छुपाया हुआ उधड़े रिश्तों का पैबंद
मखमली कालीन से लिपटा हुआ विरह की वेदना का सच    
हठीले मन से अधिभूत अहंकार का व्यक्तित्व
दम तोड़ते शीश-महल को एक बूँद अमृत-सुधा की
तुम दे नहीं सकते
 


     
       





Monday, August 3, 2015

मनः-स्तिथी का विश्लेषण


उम्र बूढ़ी हो जाएगी
हसरतें कुम्हला जायेंगी
उम्मीदें धुंधली पड़ जायेंगी
मगर नफ़रत जवानी का दामन
न छोड़ पाएगी
शक की कच्ची बौर वक़्त के साथ
और परिपक्व होती जाएगी
उजली चांदनी विरह की काई को
ढक देगी मगर
मन के धरातल से
उखड़ न पाएगी
विश्वास-अविश्वास के द्वंदों से
मुक्त हो आत्मा
उलझी गाँठों के पट
न खोल  पाएगी
न सूर्य दे पायेगा उस अंधे हो चुके
अहसास को प्रकाश
न चांदनी ही चमका पाएगी उसकी हठीली
परतों की कयास
अग्नि भी न जला पाएगी उसका
सूखे पत्तोंकी तरह
फड़फड़ाता जर्जर अंधविश्वास
समय की नदी यूँ ही शांत,स्थिर
मूक प्रेम की बाढ़
नैनों में लिए अतृप्त-कामनाओं के
बाँध तोड़ती जायेंगी
पुरातन जख्म से लवालब वृक्ष
विस्तार को
प्राप्त होता जाएगा
मन का अटल अंध- विश्वास दृढ़ता से
जड़ों में घुलता जाएगा
नेह का कोई भी शस्त्र उस अहंकारी
फलते-फूलते वृक्ष की डालिओं को
काट न पायेगा
समय का चक्र भूत को पीछे छोड़
अतीत को निहारता
भविष्य के गर्भ में
समाता जाएगा
ह्रदय का रीतापन
रीता ही रह जाएगा
       

Saturday, August 1, 2015

हारती कोशिश

एहले गुरूर मैंने कितने सावन तेरी नज़र कर दिए
इस दिल को बारिश में भीगने का अधिकार न था
मैं नज़रों के तीर लिए उम्र भर बैठी रही
कोई भी निशाना उसके सीने के पार न था
उसके दिल मे सुराख करके मोहब्बत को निकाल लाये
मेरा कोई भी खंज़र इतना धारदार न था
उसने ले रखे हैं बेशुमार मोहब्बतों के उधार गैरों से
तभी वो मेरी वफ़ा का कर्ज़दार न था
मैंने कभी घर छोड़ा नही उसने कभी रोका नहीं
इतना ज़हर पी जाउंगी मैं  हालात ने कभी सोचा न था
वो बना रहा उम्रभर गैरों का ही खिदमदगार
उसे मेरी वफ़ा पर कभी एतबार न था
अब तो ख़्वाबों ने भी उम्मीदों का दामन छोड़ दिया हैं
टूटते सितारों को कभी अम्बर को तकना न था      
   

Friday, July 31, 2015

भर्म का ज़ुनून


रहस्यमयी समुन्दर उफान का सच
भाँपने नहीं देता
बेफिक्र वज़ूद आईने के भीतर
झाँकने नहीं देता
हठीला अन्तःकरण रिश्तों की गाँठ
खोलने नहीं देता
मन का संयम इन्द्रियों को
भटकने नहीं देता
कर्म का सिद्धांत देह के स्वाभिमान को
त्यागने नहीं देता
परिणाम का इन्तजार मायुसीओं का द्वार
बंद होने नहीं देता
अनिष्ट का डर आस्था की शमा
बुझने नहीं देता
ये हार का मंज़र तिरस्कार का दर्पण
टूटने नहीं देता
धुरी का चक्र कामनाओं का बहाव
रुकने नहीं देता
ख्याति का लोभ नर को नारायण
बनने नहीं देता
शक का चूल्हा प्रेम की रोटियां
सिकने नहीं देता
बासी प्रेम अपनीयत का स्वाद
चखने नहीं देता
कोई तीसरा दो दिलों को एक
होने नहीं देता
अधपका रिश्ता जीवन में उल्लास
घुलने नहीं देता
कान का कच्चापन सच्चाई का पैमाना
मापने नहीं देता
विश्वास की सड़न प्रेम के अंकुर
फूटने नहीं देती
पाखण्ड की कश्ती द्वेष का सूरज
डूबने नहीं देती
अंधी श्रद्धा सच्चाई की कलम का ढक्कन
खुलने नहीं देती
भर्म की तपिश नफरतों की बदली
छटनें नहीं देती
मोहरों की चाल बाज़ी का रुख
पलटने नहीं देती
लकीरों की हथेली लिखा हुआ फलसफा
मिटने नहीं देती  
उम्र की नदी धाराओं की गति को
थमने नहीं देती  
फिसलती हथेली दौलतों-शोहरतों की मुट्ठी
भींचने नहीं देती
मौत की आंधी एक तिनका भी अपने साथ
उड़ाने नहीं देती   

Wednesday, July 29, 2015

समझने की समझ

कब बिखर जाये रेत की तरह जिंदगी
ये तो बस इक लम्हे की बात होती है
कितना भी समझ लो खुद को कश्तीबाज़ तुम
पतवार तो बस उसी के हाथ होती है
कागजों के ढेर पर खड़े कर लो कितने भी अहंकार के महल
इक तीली तो बस उसी के पास होती है
मत दुखाओ दिल किसी मजबूर का तुम
इक आह! बस उस तक पहुँचने की बात होती है
मत समझना हरा दिया है तुमने किसी के एतबार को
उसकी तो हार मे भी जीत की मात होती है
अहम की आग से क्या भड़काओगे शोलों को
उसकी तो तड़प मे भी शबनम की बात होती है
मज़बूर नज़रों को झुकाकर खेलते हो दिल से बहुत
उसकी तो बस एक डोर खीचने की बात होती है
मुखौटे पहनकर महफ़िलों में घूमना आसां है बहुत
उसकी तो परछाईं भी आईने को ललकार होती है
चौड़े कंधे न उठा पाएंगे वीरानियों,बेड़ियों,जिल्लतों का बोझ
उसके लिए तो ये आँचल की सौगात होती है
मत फेंको कंकड़ कोई हलचल अब उथल कर बाहर आएगी नहीं
ये तो रेत के पानी में बैठ जाने की बात होती है
बेवफाइयों पर पर्दा डालो या गुनाहों का इसरार करो
ये तो बस निगाहों से उतर जाने की बात होती है
अहसानों से तपी मिट्टी की हो या हो सोने की छत
उसके लिए तो बस सर छुपाने की बात होती है
जख्म देकर खुरचना उसकी आदत मे है शुमार
उसकी समझ में तो ये बस इक आदत की बात होती है
तुम कभी उनकी तरह भीतर न घुस पाओगी
ये तो बस नसों में दौड़ते खूं की रफ़्तार होती है
यूँही बेफिक्र अंदाज न रख ऐ अमिता
उसके लिए तो ये कर गुजरने की बात होती है

 


   

Tuesday, July 21, 2015

आस की प्यास

हम धोखे के खंजर
अपनी पीठ पर खाए बैठे हैं
कहीं उड़ न जाएं उसकी
बेवफाइयों के चर्चे
हम खामोशियों के दरिया में
खुद को डुबोये बैठे हैं
चेहरे पर मुस्कराहट का
नकाब डाल निकलते हैं घर से
कही उफन न जाये गालों पर
गम का सागर हम दिल के
जज़्बातों को चट्टानों से टकराये बैठे हैं
भीतर की उदासी कहीं खोल न दे
तहखानों की कुण्डी हम दिल की
हसरतों पर पहरा लगाये बैठे हैं
गलतफहमियों का जंगल भड़का न दे
कही नफरत के शोलों को
हम बारिश की बूंदों को
पलकों पर संजोएं बैठे हैं
तू न सही तेरा अक्स ही सही
हम पिघलती मोम को हथेलियों
में छुपाये बैठे हैं
जलते हुए अरमानो से
पिघल जायेगा हिमालय
इसी उम्मीद का दिया चौखट
पर जलाये बैठे हैं
हम चाहत की लकड़ी से
उम्र का चूल्हा जलाये बैठे है
कभी तो पकेंगी मोहब्बत की रोटियां
हम अरमानों का थाल सजाये बैठे हैं 

Sunday, July 19, 2015

मैं कविता कहती हूँ

मैं भारी- भरकम शब्दों से
अहसासों को नहीं तोलती
मैं ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर
विचारों को नहीं मोड़ती
मैं गहराई के समुन्दर मे
डूब-डूबकर अक्षरों को नहीं बीनती
मैं व्याकरण के गूढ़ रहस्य
की परतों को खुरच-खुरच
कर नहीं खुरचती
मैं जज़्बातों के दरियाँ में
मन को उतराये रहती हूँ
मैं खुशियों की खाली झोली को
अल्फ़ाज़ों की भेंट चढ़ाये रहती हूँ
मैं बाहर के कोलाहल से विमुक्त हो
भीतर के शोर का बिगुल बजाये रहती हूँ
मैं आस-पास के सजीव-चित्रण को
मन के श्याम-पटल पर उकराये रहती हूँ
मैं सामाजिक परिवेश से उपजे नन्हें पौधों
का सजीव-चित्रण दर्शाये रहती हूँ
मैं मन के दर्पण में झांक-झांककर
व्यथा,कुंठा,मजबूरी की हताशा का
चेहरा समाज के रचयिता को दिखाए रहती हूँ
मैं कागज़ और कलम से मथ-मथकर
सोच का समुन्दर आशा की कुछ बूंदे
निराशा की लपटों से झुलसे तन-मन
पर बरसाए रहती हूँ
उनके अनमोल समय से कुछ पल चुराए रहती हूँ
हाँ मैं कविताएं कहती हूँ................



   
 


  

Monday, July 13, 2015

छुपा ज़मीर

उसकी नज़र बहुत कुछ बोलती है
मै उसकी नज़रों से खुद को बचाये
घूमती रहती हूँ
उसके खामोश लबों से फूटकर
बाहर न आ जाएँ
ढके-मुदे गहरे राज़
जो बहुत समय से वो
अपने कंधे पर ढोये जी रहा है
एक बनावटी जिंदगी
कहीं थक न जाए उसका चेहरा
मुखौटा पहने-पहने
मै उसके असली चेहरे को
भूल चुकी हूँ
इसीलिए छुपा दिए हैं
सब आईने अतीत के मैंने
कुछ वक़्त और गुजर जाए
ऐसे ही अनजान बनकर
गर पहचान हो गयी तो
मै सचमुच बिखर जाऊगीं
किसी टूटे हुए घुंघुरू की तरह