Wednesday, July 29, 2015

समझने की समझ

कब बिखर जाये रेत की तरह जिंदगी
ये तो बस इक लम्हे की बात होती है
कितना भी समझ लो खुद को कश्तीबाज़ तुम
पतवार तो बस उसी के हाथ होती है
कागजों के ढेर पर खड़े कर लो कितने भी अहंकार के महल
इक तीली तो बस उसी के पास होती है
मत दुखाओ दिल किसी मजबूर का तुम
इक आह! बस उस तक पहुँचने की बात होती है
मत समझना हरा दिया है तुमने किसी के एतबार को
उसकी तो हार मे भी जीत की मात होती है
अहम की आग से क्या भड़काओगे शोलों को
उसकी तो तड़प मे भी शबनम की बात होती है
मज़बूर नज़रों को झुकाकर खेलते हो दिल से बहुत
उसकी तो बस एक डोर खीचने की बात होती है
मुखौटे पहनकर महफ़िलों में घूमना आसां है बहुत
उसकी तो परछाईं भी आईने को ललकार होती है
चौड़े कंधे न उठा पाएंगे वीरानियों,बेड़ियों,जिल्लतों का बोझ
उसके लिए तो ये आँचल की सौगात होती है
मत फेंको कंकड़ कोई हलचल अब उथल कर बाहर आएगी नहीं
ये तो रेत के पानी में बैठ जाने की बात होती है
बेवफाइयों पर पर्दा डालो या गुनाहों का इसरार करो
ये तो बस निगाहों से उतर जाने की बात होती है
अहसानों से तपी मिट्टी की हो या हो सोने की छत
उसके लिए तो बस सर छुपाने की बात होती है
जख्म देकर खुरचना उसकी आदत मे है शुमार
उसकी समझ में तो ये बस इक आदत की बात होती है
तुम कभी उनकी तरह भीतर न घुस पाओगी
ये तो बस नसों में दौड़ते खूं की रफ़्तार होती है
यूँही बेफिक्र अंदाज न रख ऐ अमिता
उसके लिए तो ये कर गुजरने की बात होती है

 


   

1 comment:

  1. We think we live big, we think big and with so much swagger around we forgot how minuscule we really are in this word.
    Amazing words, powerful to keep you rooted.

    ReplyDelete