Tuesday, September 8, 2015

बस कुछ वक्त और

बस कुछ वक्त और
वक्त की उंगली थाम
सांसारिक भूल-भुलैया के चक्रव्यूह में
भटकते रहना है
फ़र्ज़ की दहलीज़ पर
कर्तव्य की लाठी टेक
उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते रहना है
बस कुछ वक्त और.............
कुछ ख्वाहिशों से सजाकर
एक छोटा सा नीड़
कुछ मिट्‍टी के सकोरों में
स्नेह से उड़ेलकर
उज्ज्वल भविष्य के
सपनों का नीर
बूँद-बूँद एहसास को
घूँट-घूँट गटकते रहना है
बस कुछ वक्त और........................
रास्ते के पत्थरों को
बुहारकर
चट्टानों के बीच से एक दरिया
निकालकर
मंज़िल को लगन से
तराशकर
अविरल बहती शांत नदी से
प्रेरणा माँगकर
सांसो को जीवन के मोती की माला में
पिरोते रहना है
बस कुछ वक्त और................
कुछ यादें गुजरे पलों की
बगिया से सींचकर
कुछ पुराने ख़त दिल के
तहखाने से ढूँढकर
कुछ ख्वाब रेत के दामन
में उकेरकर
चाँदनी रात का उजाला विचलित मन के
पोरों में भरते रहना है
बस कुछ वक्त और....................
आत्म-बल की शक्ति से
मुश्किलों को जीतकर
क्षमा के दान से आत्मा को
खंगालकर
संतोष और धैर्य से
रिश्तों को सँवारकर
इस तुच्छ-देह को इन अमूल्य गुणों से
अलंकृत करते रहना है
बस कुछ वक्त और.........................
संकल्पित ताप से इस देह को
तपाकर
यश की बौछार से प्रियजनों
को भिगाकर
गुमनाम भीड़ में एक अलग
पहचान बनाकर
अमृत और मृत्यु के स्वाद को
चखते रहना है
बस कुछ वक्त और.......................



   

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