Monday, July 13, 2015

छुपा ज़मीर

उसकी नज़र बहुत कुछ बोलती है
मै उसकी नज़रों से खुद को बचाये
घूमती रहती हूँ
उसके खामोश लबों से फूटकर
बाहर न आ जाएँ
ढके-मुदे गहरे राज़
जो बहुत समय से वो
अपने कंधे पर ढोये जी रहा है
एक बनावटी जिंदगी
कहीं थक न जाए उसका चेहरा
मुखौटा पहने-पहने
मै उसके असली चेहरे को
भूल चुकी हूँ
इसीलिए छुपा दिए हैं
सब आईने अतीत के मैंने
कुछ वक़्त और गुजर जाए
ऐसे ही अनजान बनकर
गर पहचान हो गयी तो
मै सचमुच बिखर जाऊगीं
किसी टूटे हुए घुंघुरू की तरह

 

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