Wednesday, October 21, 2015

इंसाफ की पुकार

इक डली हकीक़त की जो तूने
चख ली होती
ता-उम्र मोहब्बत की फिर
यूँ आज़माइश न होती

एक पन्ना एतबार का जो तूने
पढ़ लिया होता
फरेब की स्याही से फिर
यूँ हथेली रंगवाई न होती

एक चाँद वफ़ा का जो तूने
गटक लिया होता
कतरा-कतरा चाँदनी फिर
यूँ बहाई न होती

एक ख्वाब चाहत का जो तूने
बुन लिया होता
सर्द रातों की तन्हाई फिर
यूँ ठिठुराई न होती

एक हठ गुरूर का जो तूने
तोड़ दिया होता
रिश्तों की नीव फिर
यूँ लड़खड़ाई न होती

एक कँवल सच का जो तूने
खिला दिया होता
झूठ से हर शाम फिर
यूँ मुरझाई न होती

एक पिंजरा तंगदिली का जो तूने
खोल दिया होता
रूह,रूह से लिपटने को फिर
यूँ फ़ड़फ़ड़ाई न होती

एक अंगार हौंसले का जो तूने
छू लिया होता
मोहब्बत की सरेराह फिर
यूँ रुसवाई न होती

लिफ़ाफ़ा देखकर मज़मून जो तूने
भाँप लिया होता
दम तोड़ती मोहब्बत की फिर
यूँ राख उड़ाई न होती  

एक फैंसला दिल से जो तूने
चुन लिया होता
इंसाफ की चौखट पर फिर
यूँ जीत लजायी न होती

नादान मोहब्बत को जो तूने
अपना लिया होता
शम्माये इश्क़ की लौ फिर
यूँ बुझायी न होती      

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