थक गयी हूँ बहुत
ख़ुद की आज़माइश करते-करते
भावना-हीन वृक्ष की जड़ों
को अश्क़ों से सींचते-सीचते
बहुत दूर् निकल आयी हूँ
एक रिश्ता निभाते-निभाते
इक जिस्म घसीट लायी हूँ
इक दाग छुपाते-छुपाते
चुक गयी हूँ बहुत
एक डर पालते-पालते
टूट गयी हूँ बहुत
एक पहचान सँभालते-सँभालते
रह गया है बस एक रीतापन
बचा खजाना खंगालते-खंगालते
गुम हो गया है वजूद
खुद को तलाशते-तलाशते
खुश्क हो गयी है रूह
एक बूँद चाहत मांगते-मांगते
सुर्ख हो गई हैं हथेलियाँ
सुर्ख हो गई हैं हथेलियाँ
खौलता गुबार ढांपते -ढांपते
धुंधली पड़ गयी है नज़र
भविष्य का मज़्मून भांपते-भांपते
पथरा गयी है आँखे
वफ़ा का एक पल ताकते-ताकते
ज़ख़्मी हो गया है विश्वास
जफ़ा का नासूर सालते-सालते
कट गयी है उम्र
दिलों से कांटे बुहारते-बुहारते
लड़खड़ा गया है हौसला
पत्थर-दिल बुत को तराशते-तराशते
फिसल गयी है रेत खुशियों की
बस इक नाम उकारते -उकारते
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