Friday, September 11, 2015

बुझी राख

थक गयी हूँ बहुत 
ख़ुद की आज़माइश करते-करते
भावना-हीन वृक्ष की जड़ों
को अश्क़ों से सींचते-सीचते
बहुत दूर् निकल आयी हूँ
एक रिश्ता निभाते-निभाते
इक जिस्म घसीट लायी हूँ
इक दाग छुपाते-छुपाते
चुक  गयी हूँ  बहुत 
एक डर पालते-पालते 
टूट गयी हूँ  बहुत 
एक पहचान सँभालते-सँभालते   
रह गया है बस एक रीतापन 
बचा खजाना खंगालते-खंगालते 
गुम  हो गया है वजूद
खुद को तलाशते-तलाशते 
खुश्क हो गयी है रूह 
एक  बूँद चाहत मांगते-मांगते
सुर्ख हो गई  हैं  हथेलियाँ 
खौलता गुबार  ढांपते -ढांपते  
धुंधली  पड़ गयी है नज़र
भविष्य  का मज़्मून भांपते-भांपते 
पथरा गयी है आँखे 
वफ़ा  का एक पल ताकते-ताकते 
ज़ख़्मी हो गया है विश्वास 
जफ़ा का नासूर  सालते-सालते 
कट गयी है उम्र 
दिलों से कांटे बुहारते-बुहारते 
लड़खड़ा गया है हौसला 
पत्थर-दिल बुत को तराशते-तराशते 
फिसल गयी है रेत  खुशियों की 
बस इक नाम उकारते -उकारते

   
                                                                                                                          

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