सांसे कैद करके खुदगर्जी के पिंजरे में
तुम कहते हो उन्मुक्त उड़ान के पंख
दिए हैं तुम्हे
जिन्दा दफ़न करके इस मिट्टी की काया को
भावनाओं के रेगिस्तान में
तुम कहते हो खुला आकाश निहारने को स्वप्न
दिए हैं तुम्हे
अतृप्त अभिलाषाओं को सीने से बाहर
झाँकने भी नहीं देते
प्रकाश का एक पुंज हृदय के धरातल पर
प्रज्जवलितं होने भी नहीं देते
कहते हो सुनहरी मांग सजाने को
तेजस्वी पुंज दिए हैं तुम्हे
नाम देकर एक शक्ति का मुझको
बेबस और लाचारी की कुटिया में बैठाकर
नैतिकता और धर्म का पाठ पढ़ाकर
खींचकर लक्ष्मण-रेखा का आश्रय
तुम कहते हो कस्तूरी- मृग
दिए है तुम्हे
स्वर्ग और पृथ्वी के बीच संपूर्ण आकाश है तुम्हारा
दम्भ-मान से अधिभूत इस बलशाली काया का
समाज गुलाम है तुम्हारा
दो बूँद चाहत से व्याकुल इस लचकती डाली में
ममता का फूल खिलाकर
झुकी-सहमी, थरथराती पहचान थमाकर
तुम कहते हो लहलहाने को वायु के भण्डार
दिए हैं तुम्हे
तुम कहते हो उन्मुक्त उड़ान के पंख
दिए हैं तुम्हे
जिन्दा दफ़न करके इस मिट्टी की काया को
भावनाओं के रेगिस्तान में
तुम कहते हो खुला आकाश निहारने को स्वप्न
दिए हैं तुम्हे
अतृप्त अभिलाषाओं को सीने से बाहर
झाँकने भी नहीं देते
प्रकाश का एक पुंज हृदय के धरातल पर
प्रज्जवलितं होने भी नहीं देते
कहते हो सुनहरी मांग सजाने को
तेजस्वी पुंज दिए हैं तुम्हे
नाम देकर एक शक्ति का मुझको
बेबस और लाचारी की कुटिया में बैठाकर
नैतिकता और धर्म का पाठ पढ़ाकर
खींचकर लक्ष्मण-रेखा का आश्रय
तुम कहते हो कस्तूरी- मृग
दिए है तुम्हे
स्वर्ग और पृथ्वी के बीच संपूर्ण आकाश है तुम्हारा
दम्भ-मान से अधिभूत इस बलशाली काया का
समाज गुलाम है तुम्हारा
दो बूँद चाहत से व्याकुल इस लचकती डाली में
ममता का फूल खिलाकर
झुकी-सहमी, थरथराती पहचान थमाकर
तुम कहते हो लहलहाने को वायु के भण्डार
दिए हैं तुम्हे
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