Thursday, September 17, 2015

बहुत अहसान किये हैं तुमने

सांसे कैद करके खुदगर्जी के पिंजरे में
तुम कहते हो उन्मुक्त उड़ान के पंख
दिए हैं तुम्हे
जिन्दा दफ़न करके इस मिट्टी की काया को
भावनाओं के रेगिस्तान में
तुम कहते हो खुला आकाश निहारने को स्वप्न
दिए हैं  तुम्हे
अतृप्त अभिलाषाओं को सीने से बाहर
झाँकने भी नहीं देते
प्रकाश का एक पुंज हृदय के धरातल पर
प्रज्जवलितं होने भी नहीं देते
कहते हो सुनहरी मांग सजाने को
तेजस्वी पुंज दिए हैं तुम्हे
नाम देकर एक शक्ति का मुझको
बेबस और लाचारी की कुटिया में बैठाकर
नैतिकता और धर्म का पाठ पढ़ाकर
खींचकर लक्ष्मण-रेखा का आश्रय
तुम कहते हो कस्तूरी- मृग
दिए है तुम्हे
स्वर्ग और पृथ्वी के बीच संपूर्ण आकाश है तुम्हारा
दम्भ-मान से अधिभूत इस बलशाली काया का
समाज गुलाम है तुम्हारा
दो बूँद चाहत से व्याकुल इस लचकती डाली में
ममता का फूल खिलाकर
झुकी-सहमी, थरथराती  पहचान थमाकर
तुम कहते हो लहलहाने को वायु के भण्डार
दिए हैं तुम्हे            

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