Monday, November 2, 2015

उग रहा है बदलाव

फूट  रहीं हैं बालियाँ
लहलहा रहे हैं  कोपल                                                             
भीग रहा है धरा का आँचल
गर्वित बौछार से
फैल रही हैं व्यक्तित्व की किरणें 
हौसले के अंगार से
इतिहास की नीँव, पुरानी हो रही है
बेटियाँ  सयानी हो रही हैं
गढ़ रहे हैं नये आयाम
बेचारगी के मर्तबान से
छिटक रहा है नीर बदलाव का
चीर अम्बर  का सीना
तरक्की की रफ़्तार से
आँगन की खूंटी, भूली-बिसरी कहानी हो रही है
बेटियाँ सयानी हो रही हैं
फोड़कर  रूढ़ियों की चट्टानें
बीन रही हैं रास्ते
महका रही हैं नव-जागृति की खुशबू
अजन्मी कलियों तुम्हारे वास्ते
फैसलों के अधिकार पर, एक उंगली जनानी हो रही है
बेटियाँ सयानी हो रही हैं
बाँधकर केशों से बाँध
बहा रही हैं एक नवीन सृजनता की पहचान
उतारकर लोहे को ममता के दूध में
खोद रही हैं एक नया समाज
अस्तित्व के सम्मान में 
बोझ हैं कांधे का, यह सोच शर्म से पानी-पानी हो रही है
बेटियाँ सयानी हो रही हैं
                                                           
                                                    

                                  





         







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