Saturday, September 12, 2015

काश ऐसा हो जाए

भूला -भटका एक चाहत का पल
कहीं से खाली तमन्नाओं की झोली में
चुपके से आ  जाये
हर्षित घुंघरूओं  की झंकार
उदास नीरस -जीवन को
फिरकनी सा नचा जाए
सतरंगी बहार से महक जाए
दुखी आँचल
ख़ुशियों के श्रृंगार से लरज जाए
मदमस्त यौवन
नेह की बौछार से भीग जाए
द्रवित तन-मन
बादलों के पार पहुँच जाए
मूक-समर्पण
टूटकर बिखर जाए अहम में
पिरोया वज़ूद
तुम्हारे भीतर खो जाए
ये देह ये  रूप
खामोश हो जायें  ये लब
खामोश हो जाए ये हठ
उठाकर रख दूं मैं  भी नाज़-गुमान
एक कोने में
उठाकर रख दो तुम भी अहंकार-दौलत
एक कोने  में
मैं भी खाली, तुम भी खाली
बस एक चाहत की कशिश
दोनों के दिलों की तिजोरी
भर जाए
बेनूर तन्हाई की रातों को
खिलखिलाती चाँदनी से
नहला जाय्रे   
काश एक भूला-भटका चाहत का पल
कहीं  से आ जाए    
स्याह-सफ़ेद मायूसियों के पन्नों को
रंगीन लम्हों से सजा जाए
काश...............................


















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