Friday, August 21, 2015

विदाई की रीत

जो अठखेलियाँ करती थी कभी
विस्तृत आकाश में
स्वप्न सजीले बुनती थी कभी
तारों की छाँव में
लुका- छुपी खेलती थी कभी
काली-घनी बदलियों के साम्राज्य में
गरजता बादल भी कभी जिसकी मोहक मुस्कान से
पिघल जाया करता था
सूरज का तेज़ भी कभी जिसके आगे फीका
पड़ जाया करता था
ठंडी पुरवाई जिसकी जुल्फें
संवारा करती थी
चंदा की चांदनी भी जिसका
रूप निहारा करती थी
आज सावन में भीगे गीतों के साथ
हो रही है उसकी विदाई
हाय ! रे विधाता, ये क्या रीत तुमने बनाई
अम्बर की रानी मिट्टी से उपजे राजमहल में
बसने को आई
एक थरथराता पत्ता क्या संभाल पायेगा
उसका अस्तित्व
या मिट्टी में मिल जायेगा कुंवारे सपनों
का संगीत
इतनी गहरी हो चुकी जड़ों का परिवेश
उस पत्ते से छूट न पायेगा
तब उस बूँद का अस्तित्व ही अपनी
पहचान खो जायेगा
उसकी उन्मुक्त-खनकती हंसी का बोझ
ये विशाल पुरातन-वृक्ष न उठा पायेगा
बांधकर उसको हजारों रीति-रिवाज़ों
की बेलों से
सांस लेने का अधिकार भी उससे
छिन जायेगा
उनकी इच्छाओं के बोझ-तले रूप का
कमल कुम्हला जायेगा
दम तोड़ती हसरतों की नदिया को
समुन्दर का वेग पी जायेगा
काली- घटा का नीर भी मन की उदासी को
न धो पायेगा
तालाब का मालिक भी याचना से निहारते
शुष्क अधरों को इक बूँद अमृत-सुधा की
 न दे पायेगा
रूढ़ियों का इतिहास धुरी का चक्र न बदल पाया है
न बदल पायेगा
पथराई आँखों को समानता का अधिकार अभी और
इंतज़ार करवाएगा
परिवर्तन का देवता अभी और बलि चढ़वाएगा
परिवर्तन का देवता ..................................
 

   
                    

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