Monday, August 3, 2015

मनः-स्तिथी का विश्लेषण


उम्र बूढ़ी हो जाएगी
हसरतें कुम्हला जायेंगी
उम्मीदें धुंधली पड़ जायेंगी
मगर नफ़रत जवानी का दामन
न छोड़ पाएगी
शक की कच्ची बौर वक़्त के साथ
और परिपक्व होती जाएगी
उजली चांदनी विरह की काई को
ढक देगी मगर
मन के धरातल से
उखड़ न पाएगी
विश्वास-अविश्वास के द्वंदों से
मुक्त हो आत्मा
उलझी गाँठों के पट
न खोल  पाएगी
न सूर्य दे पायेगा उस अंधे हो चुके
अहसास को प्रकाश
न चांदनी ही चमका पाएगी उसकी हठीली
परतों की कयास
अग्नि भी न जला पाएगी उसका
सूखे पत्तोंकी तरह
फड़फड़ाता जर्जर अंधविश्वास
समय की नदी यूँ ही शांत,स्थिर
मूक प्रेम की बाढ़
नैनों में लिए अतृप्त-कामनाओं के
बाँध तोड़ती जायेंगी
पुरातन जख्म से लवालब वृक्ष
विस्तार को
प्राप्त होता जाएगा
मन का अटल अंध- विश्वास दृढ़ता से
जड़ों में घुलता जाएगा
नेह का कोई भी शस्त्र उस अहंकारी
फलते-फूलते वृक्ष की डालिओं को
काट न पायेगा
समय का चक्र भूत को पीछे छोड़
अतीत को निहारता
भविष्य के गर्भ में
समाता जाएगा
ह्रदय का रीतापन
रीता ही रह जाएगा
       

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