अल्हड़ प्रेम से झुकी डाली
प्यार-मनुहार से हठ कर
चूमती है धरा का मस्तक
और मांगती है आशीष
एक वादे के एतबार पर
अर्पण करने को तन-मन
सहेज कर रखा जो मैंने
फ़न उठाये बवंडर से संभाल कर
टूटने न दिया जिस विश्वास को
आज हर्षित महसूस कर रही हूँ
उसको न्योछावर कर प्रेम-पर
मेरे मन का माली तोड़कर ले जाएगा
मेरी डाली से अमृत-फल
और तृप्त करेगा आत्मा
मूक-प्रशंसा से चखकर
समां लेगा रूप का रस
अपने हृदय के भीतर
और गायेगा गीत बहारों के
खुशी से झूमकर
मगर मुझको ये गुमान न था
छोड़ देगा साथ मेरा वो
समाज के शिकंजे में कसकर
और कुरीतियों की भेंट चढ़ जाएगा
एक और असहाय बीज
समाज से आहत होकर
ऐ धरा ! मुझको है पता
क्षमाकर, मेरी इस भूल को
तू बड़ी सरलता से समाएगी
उस समाज से तिरस्कृत बीज को
अपने भीतर
इंसानियत के प्रकाश से सींचकर
लहलहाएगी एक और पौधा अपनत्व का
कीचड़ में सनकर भी जो
कमल बनकर खिलेगा
रूप-गुण की खान से जो इस संसार को
गर्वित करेगा
किसी जाति-धर्म के बंधन में जो न बंधेगा
पाठ पढ़ाकर समानता का जो सर उठाये
आकाश को गर्व से छुयेगा
किसी नदी-नाले,तालाब में जो न बहेगा
रात की कालिख से बनाकर स्याही तकदीर की जो
अपनी गाथा स्वयं गढ़ेगा
मुझको है विश्वास एक ऐसा सूर्य
इक्कीसवीं-सदी में जरूर उगेगा
माँ की असहायता और बाप की कायरता का दण्ड
जिसको न मिलेगा
जिसके स्वाभिमान से ऊँच-नीच,अमीर-गरीब,
जाति-धर्म का पत्थर अवश्य पिघलेगा
और समानता का जुनून बनकर वो लावा
किसी आरक्षण को फिर न तकेगा
उम्मीद से भरी आँखों को है आस कि इन
भविष्य की धरोहरों को एक युग बदलाव का
जरूर मिलेगा
एक युग बदलाव का.. .... …… ....
प्यार-मनुहार से हठ कर
चूमती है धरा का मस्तक
और मांगती है आशीष
एक वादे के एतबार पर
अर्पण करने को तन-मन
सहेज कर रखा जो मैंने
फ़न उठाये बवंडर से संभाल कर
टूटने न दिया जिस विश्वास को
आज हर्षित महसूस कर रही हूँ
उसको न्योछावर कर प्रेम-पर
मेरे मन का माली तोड़कर ले जाएगा
मेरी डाली से अमृत-फल
और तृप्त करेगा आत्मा
मूक-प्रशंसा से चखकर
समां लेगा रूप का रस
अपने हृदय के भीतर
और गायेगा गीत बहारों के
खुशी से झूमकर
मगर मुझको ये गुमान न था
छोड़ देगा साथ मेरा वो
समाज के शिकंजे में कसकर
और कुरीतियों की भेंट चढ़ जाएगा
एक और असहाय बीज
समाज से आहत होकर
ऐ धरा ! मुझको है पता
क्षमाकर, मेरी इस भूल को
तू बड़ी सरलता से समाएगी
उस समाज से तिरस्कृत बीज को
अपने भीतर
इंसानियत के प्रकाश से सींचकर
लहलहाएगी एक और पौधा अपनत्व का
कीचड़ में सनकर भी जो
कमल बनकर खिलेगा
रूप-गुण की खान से जो इस संसार को
गर्वित करेगा
किसी जाति-धर्म के बंधन में जो न बंधेगा
पाठ पढ़ाकर समानता का जो सर उठाये
आकाश को गर्व से छुयेगा
किसी नदी-नाले,तालाब में जो न बहेगा
रात की कालिख से बनाकर स्याही तकदीर की जो
अपनी गाथा स्वयं गढ़ेगा
मुझको है विश्वास एक ऐसा सूर्य
इक्कीसवीं-सदी में जरूर उगेगा
माँ की असहायता और बाप की कायरता का दण्ड
जिसको न मिलेगा
जिसके स्वाभिमान से ऊँच-नीच,अमीर-गरीब,
जाति-धर्म का पत्थर अवश्य पिघलेगा
और समानता का जुनून बनकर वो लावा
किसी आरक्षण को फिर न तकेगा
उम्मीद से भरी आँखों को है आस कि इन
भविष्य की धरोहरों को एक युग बदलाव का
जरूर मिलेगा
एक युग बदलाव का.. .... …… ....
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