Saturday, December 26, 2015

एक ख़्वाहिश

काश ! पलट जाती बाजी शतरंज की
और तक़दीर के मोहरों ने चल दी होती
एक शातिर चाल
हम भी जीत जाते एक पाक रूह
और बिछा देते प्रेम के धरातल पर
दिल की बिसात
मगर क्या करें ? कुछ मुकद्दर था गद्दार
कुछ कमी थी भेजे में
भाँप ही नहीं पाये हक़ीक़त के मोहरे
और फ़ना हो गयीं खुशियाँ
शह और मात के चक्रव्यूह में फंसकर
बहुत आसानी से घिर गया
गलत पाले में फड़फड़ाता वज़ूद
अब किसके कानों में पिघलाएं लावा
सब हैं स्वार्थ-प्रदूषण के शिकार
कोई किसी के दर्द में होकर शुमार
खोना नहीं चाहता अपना ऐतबार
सच की आँखों में बाँधकर पट्टी
देखना चाहते हैं सभी सतरंगी इन्द्रधनुष
और सेंकना चाहते हैं सुनहरी धूप
उगते सूर्य को देकर अर्ध्य मतलबखोरी का
डूबते सूर्य से पीछा छुड़ाना चाहते हैं सब
क्योंकि यह मतलब से बुना संसार है
यहाँ भावनाओं को पिरोना बिल्कुल बेकार है
यहाँ भावनाओं को पिरोना.............................................|                        

No comments:

Post a Comment