ग़म की चाशनी में लिपटे हुए लम्हों
हम तुम्हारा सलाम क़ुबूल करते हैं
वो मुकर गए हैं अपने वादों से तो क्या
हम एक क़तरा उम्मीद क़ुबूल करते हैं
मत कहो उनको बेवफ़ा ऐ ज़माने वालों
हम उनका ये तोहफा भी क़ुबूल करते हैं
वो दे न पाये एक रात चांदनी की तो क्या
हम चाँद अमावस का क़ुबूल करते हैं
हम तुम्हारा सलाम क़ुबूल करते हैं
वो मुकर गए हैं अपने वादों से तो क्या
हम एक क़तरा उम्मीद क़ुबूल करते हैं
मत कहो उनको बेवफ़ा ऐ ज़माने वालों
हम उनका ये तोहफा भी क़ुबूल करते हैं
वो दे न पाये एक रात चांदनी की तो क्या
हम चाँद अमावस का क़ुबूल करते हैं
जिस्म के भँवर में खोकर क्या होगा हासिल
हम रूहे किनारा क़ुबूल करते हैं
तुम महफ़िलों के आकाश में खुलकर उड़ो
हम तन्हाइयों का पिंजरा क़ुबूल करते हैं
फ़कत हक़ जो जमाये वो मोहब्बत हो नहीं सकती
हम दिल से यह हक़ीकत क़ुबूल करते हैं
तुम दूर रहकर गर मेरे साये से लिपट जाओ
ता-उम्र हम यह फ़ासला क़ुबूल करते हैं
महफ़िल में इनकार तन्हाई में इकरार
हम तेरी ये अदा भी क़ुबूल करते हैं
पड़ने लगे हैं छींटे अब पाक दामन पर
हम रुसवाइयों के दाग क़ुबूल करते हैं
इक शोला भड़के और मैं राख हो जाऊँ
हम तेरी ये चाहत भी क़ुबूल करते हैं
तुम उतारते रहो खंजर मासूम मोहब्बत पर
हम सर झुकाकर जुर्म-ऐ-वफ़ा क़ुबूल करते है
तुम जीतते रहो बाज़ी वज़ूद के पलटवार की
हम जीत की हार क़ुबूल करते हैं
वो साज़ ही क्या जिसमें सुर-ताल न हो
हम जफ़ा की झंकार क़ुबूल करते हैं
वो इश्क़ ही क्या जो रहमो-करम को तरसे
हम जहाँ की ललकार क़ुबूल करते हैं
टांक ही लेंगे सितारे दामन में एक रोज़
हम ज़ि-दे-वफ़ा क़ुबूल करते हैं
हम रूहे किनारा क़ुबूल करते हैं
तुम महफ़िलों के आकाश में खुलकर उड़ो
हम तन्हाइयों का पिंजरा क़ुबूल करते हैं
फ़कत हक़ जो जमाये वो मोहब्बत हो नहीं सकती
हम दिल से यह हक़ीकत क़ुबूल करते हैं
तुम दूर रहकर गर मेरे साये से लिपट जाओ
ता-उम्र हम यह फ़ासला क़ुबूल करते हैं
महफ़िल में इनकार तन्हाई में इकरार
हम तेरी ये अदा भी क़ुबूल करते हैं
पड़ने लगे हैं छींटे अब पाक दामन पर
हम रुसवाइयों के दाग क़ुबूल करते हैं
इक शोला भड़के और मैं राख हो जाऊँ
हम तेरी ये चाहत भी क़ुबूल करते हैं
तुम उतारते रहो खंजर मासूम मोहब्बत पर
हम सर झुकाकर जुर्म-ऐ-वफ़ा क़ुबूल करते है
तुम जीतते रहो बाज़ी वज़ूद के पलटवार की
हम जीत की हार क़ुबूल करते हैं
वो साज़ ही क्या जिसमें सुर-ताल न हो
हम जफ़ा की झंकार क़ुबूल करते हैं
वो इश्क़ ही क्या जो रहमो-करम को तरसे
हम जहाँ की ललकार क़ुबूल करते हैं
टांक ही लेंगे सितारे दामन में एक रोज़
हम ज़ि-दे-वफ़ा क़ुबूल करते हैं
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