Sunday, July 19, 2015

मैं कविता कहती हूँ

मैं भारी- भरकम शब्दों से
अहसासों को नहीं तोलती
मैं ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर
विचारों को नहीं मोड़ती
मैं गहराई के समुन्दर मे
डूब-डूबकर अक्षरों को नहीं बीनती
मैं व्याकरण के गूढ़ रहस्य
की परतों को खुरच-खुरच
कर नहीं खुरचती
मैं जज़्बातों के दरियाँ में
मन को उतराये रहती हूँ
मैं खुशियों की खाली झोली को
अल्फ़ाज़ों की भेंट चढ़ाये रहती हूँ
मैं बाहर के कोलाहल से विमुक्त हो
भीतर के शोर का बिगुल बजाये रहती हूँ
मैं आस-पास के सजीव-चित्रण को
मन के श्याम-पटल पर उकराये रहती हूँ
मैं सामाजिक परिवेश से उपजे नन्हें पौधों
का सजीव-चित्रण दर्शाये रहती हूँ
मैं मन के दर्पण में झांक-झांककर
व्यथा,कुंठा,मजबूरी की हताशा का
चेहरा समाज के रचयिता को दिखाए रहती हूँ
मैं कागज़ और कलम से मथ-मथकर
सोच का समुन्दर आशा की कुछ बूंदे
निराशा की लपटों से झुलसे तन-मन
पर बरसाए रहती हूँ
उनके अनमोल समय से कुछ पल चुराए रहती हूँ
हाँ मैं कविताएं कहती हूँ................



   
 


  

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