Friday, August 14, 2015

संकुचित मन

अम्बर से उठाकर बदली का एक टुकड़ा
तुम दे नहीं सकते
चूमकर नैनों के कोरों से
भीगे हुए अहसास का एक क़तरा
तुम दे नहीं सकते
आँखों मे  छुपाकर बीते लम्हों का अँधेरा
भोर की किरनों से नहायी
अतीत की एक पँखुड़ी का सवेरा
तुम दे नहीं सकते
राग-द्वेष की कलाकृतियाँ मिटाकर ह्रदय से
स्नेह के रंगों में डूबा
आत्मीयता का एक कैनवास
तुम दे नहीं सकते
निश्चल-प्रेम से निहारती एक निरीह बूँद को
समर्पण के आलिंगन में जकड़कर
मोती बनाने का वैभव
तुम दे नहीं सकते
संशय-रहित विश्वास से ह्रदय के तारों को
छेड़कर इक नवीन-मधुर धुन का संगीत
भविष्य की धड़कनों को
तुम दे नहीं सकते
टूटते तारों से माँगा हुआ सात- जन्मों का साथ
हवन-कुण्ड की राख से भरकर मांग का उल्लास
चुटकी भर विश्वास का अहसास
तुम दे नहीं सकते
पल-पल बिखरते-झरते हरसिंगार के पल
बीनकर दामन में सहेजकर महकती खुशबुओं से
प्रफुल्लित होकर
दो घड़ी चैन से साँसों को गिनने का मधुमास
तुम दे नहीं सकते
एक थपकी मनुहार की एक समर्पण प्रेम का
एक कशिश चाहत की बस एक पुकार मेरे नाम की
एक ख्वाहिश तुम्हारी आँखों से चाँद  गटकने की
इन अतृप्त अभिलाषाओं का एतबार
तुम दे नहीं सकते
रेशमी धागों से छुपाया हुआ उधड़े रिश्तों का पैबंद
मखमली कालीन से लिपटा हुआ विरह की वेदना का सच    
हठीले मन से अधिभूत अहंकार का व्यक्तित्व
दम तोड़ते शीश-महल को एक बूँद अमृत-सुधा की
तुम दे नहीं सकते
 


     
       





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