तुम्हारे अहंकार को जिलाने के लिये----
मैं खड़ी हूँ सतत शिला की तरह
तुम्हारे अस्तित्व को बचाने के लिये
उठ गये मेरे कदम तो तुम
चार कदम भी न चल पाओगे
मिल गयी मंज़िल मुझे तो तुम
यूँ ही भटकाव में सिमट जाओगे
तुम्हारे दंभ को बहलाने के लिये----
मैं झुकी हूँ कमज़ोर डाल की तरह
तुम्हारे खोखलेपन को छुपाने के लिये
चल गयी चाल जो मैं तो तुम
एक बाज़ी भी न जीत पाओगे
हार कर सर्वस्व अपना
जीते जी ही मर जाओगे
हारी बाज़ी जिताने के लिये----
मैं बंद कर देती हूँ द्वार मस्तिष्क के
तुम्हारी आत्म-संतुष्टि दर्शाने के लिये
चख लिया स्वाभिमान मैंने तो तुम
झुकी नज़रें न उठा पाओगे
मेरी सहनशीलता के अलाव तले
अधपका ग़ुरूर ही चख पाओगे
तुम्हारी हठधर्मिता सहलाने के लिये----
मैं गटक लेती हूँ समस्त तेज़ाब
तुम्हारी कठोरता पिघलाने के लिये
छलका दिया जो मैंने तुम्हारी
चंचलता का पैमाना तो तुम
परिष्कृत समाज न झेल पाओगे
बूझ गये जो मेरे ह्रदय की पहेली
उम्र-भर रीते ही रह जाओगे
तुम्हारे प्रेम को फुसलाने के लिये----
अश्क़ मोती से तोल लेती हूँ मैं
रूह भस्म से सुलगा लेती हूँ मैं
परंपराओं का मूल्य चुकाने के लिये----
मैं तपी हूँ एक स्वर्ण की तरह
तुम्हारी जात चमकाने के लिये
मैं खड़ी हूँ सतत शिला की तरह
तुम्हारे अस्तित्व को बचाने के लिये
उठ गये मेरे कदम तो तुम
चार कदम भी न चल पाओगे
मिल गयी मंज़िल मुझे तो तुम
यूँ ही भटकाव में सिमट जाओगे
तुम्हारे दंभ को बहलाने के लिये----
मैं झुकी हूँ कमज़ोर डाल की तरह
तुम्हारे खोखलेपन को छुपाने के लिये
चल गयी चाल जो मैं तो तुम
एक बाज़ी भी न जीत पाओगे
हार कर सर्वस्व अपना
जीते जी ही मर जाओगे
हारी बाज़ी जिताने के लिये----
मैं बंद कर देती हूँ द्वार मस्तिष्क के
तुम्हारी आत्म-संतुष्टि दर्शाने के लिये
चख लिया स्वाभिमान मैंने तो तुम
झुकी नज़रें न उठा पाओगे
मेरी सहनशीलता के अलाव तले
अधपका ग़ुरूर ही चख पाओगे
तुम्हारी हठधर्मिता सहलाने के लिये----
मैं गटक लेती हूँ समस्त तेज़ाब
तुम्हारी कठोरता पिघलाने के लिये
छलका दिया जो मैंने तुम्हारी
चंचलता का पैमाना तो तुम
परिष्कृत समाज न झेल पाओगे
बूझ गये जो मेरे ह्रदय की पहेली
उम्र-भर रीते ही रह जाओगे
तुम्हारे प्रेम को फुसलाने के लिये----
अश्क़ मोती से तोल लेती हूँ मैं
रूह भस्म से सुलगा लेती हूँ मैं
परंपराओं का मूल्य चुकाने के लिये----
मैं तपी हूँ एक स्वर्ण की तरह
तुम्हारी जात चमकाने के लिये