Wednesday, October 12, 2016

मृग-मरीचिका

मत धुँधलाओ इन्हें
ये खुशफ़हमी के साये हैं
जो नज़र तो आते हैं मगर
पकड़ में नहीं आते

सदियों से मंडरा रहे हैं ये
पलकों की मुंडेर पे
कभी स्वप्न में मुस्कुराते हैं
कभी दर्द में सहम जाते हैं

कभी झाँकते हैं सूनी उदास
आँखों में
और कभी बनकर पलाश
अंतस की बगिया में
महक जाते हैं

कभी अस्तित्व को टाँग देते हैं
एक सूली पर
और कभी बनकर सुबह
तिमिर की छटपटाहट को
निगल जाते हैं

मैं बनकर पवन उड़ जाना चाहती हूँ
मगर तभी
ये चमका देते हैं नन्हें स्वप्न
और मैं उलीच कर संशय
ओक में भर लेती हूँ
अनिश्चित भविष्य

निहारती हूँ उसे एक मासूम
बच्चे की तरह
ह्रदय-पटल से पोंछकर अनिश्चिंताओं
की धूल
छुप जाती हूँ एक बदली की ओट में

मगर तभी फट जाते हैं बादल
और निष्ठुरता के ताप से
भीग जाता है व्यथित मन

और वो साया जिसे मैं समझ रही थी
उम्मीदों का खिवैया
खींच लेता है मुझे एक काली अंधेरी
गुफा में
मस्तिष्क के गणित को करके शून्य
लील लेता है वो भूत,भविष्य,वर्तमान
भूत,भविष्य,वर्तमान

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