Tuesday, January 5, 2016

एक कोशिश

क्यूँ न ग़म के अलाव तले
रूह को तापा जाये
शायद एक नज़्म का आगाज़ हो जाये
क्यूँ न भटकाव के मोती
अलगाव के समुन्दर से बीने जाये
शायद ह्रदय शुद्ध हो जाये
क्यूँ न तन्हाई के दामन पर
सूखी यादों को बिखेरा जाये
शायद भविष्य महक जाये
क्यूँ न फैसलों के अधिकार को
मांग में उकेरा जाये
शायद सुनहरी धूप खिल जाये
क्यूँ न बदली के आगोश तले
लुप्त सितारों को पुकारा जाये
शायद दीदारे चाँद हो जाये
क्यूँ न संदेह की घाघर में
रंग केसरिया घोला जाये
शायद प्रेम छलक जाये
क्यूँ न सरहदों की बेग़ानियत में
तेज़ाब अपनीयत का उड़ेला जाये
शायद लोहा पिघल जाये
क्यूँ न समानता की कटार से
असमानता की बेडियों को काटा जाये
शायद रंग लाल हो जाये
क्यूँ न एक तीर भरोसे का
विश्वास के तरकश से छोड़ा जाये
शायद जिगर के पार हो जाये

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