Friday, March 18, 2016

चेतना

रातों का चैन दिन की ख़ुशी
रूह का उजाला भाव की नमी
सब चेतना ही तो है
ख्वाहिशें जो दिल के पिंजरे में
जवाँ होती हैं
चाहतें जो नज़रों की चिलमन से
बयाँ होती हैं
ख़्वाबों की तपन आस की पतंग
प्रेम की अगन अंतस का मिलन
सब चेतना ही तो है
जो कभी थमता नहीं वो
मन ही तो है
जो कभी डूबता नहीं वो
संशय ही तो है
भविष्य की सिरहन मन की फिसलन  
यादों की उधड़न रिश्तों की खुरचन
सब चेतना ही तो है    
जो प्रेम बिन तड़पे
वो मन ही तो है
जो फुहार बिन झुलसे
वो मन ही तो  है
मिलन का ख़ुमार मधुमास की बहार
प्यार की बौछार वफ़ा का श्रृंगार
सब चेतना ही तो है
संबंध जो जीवन को
गति देते हैं
कर्त्तव्य जो भटकाव को
मति देते हैं
वादों का ऐतबार चैतन्य की पुकार
क्षमा की फुहार बड़प्पन का दुलार
सब चेतना ही तो है
ईर्ष्या जो संवेदनाओं को
जला देती है
नफ़रत जो शोलों को
हवा देती है
कांटों की चुभन डाल की टूटन
बिछोह की दुखन भरोसे की गलन
सब चेतना ही तो है
  

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