Monday, April 11, 2016

लौ जलने दो

लौ  जलने  दो


नहीं चाहिये मुझको बापू
गुड्डे-गुड़िया और खिलौने
मुझको मेरे बापू पहना दो
अक्षर-ज्ञान के अद्भुत गहने
उस गहने की चमक से बापू
चमक जायेगा अज्ञानी आंगन
ज्ञान की गंगा में डूबकर
पार हो जायेगा अल्हड़ बचपन
और यौवन
पुस्तकों का संसार कौतूहल का
द्वार खोल जायेगा
सही-गलत का अंतर
ज्ञान का सागर
बूझ जायेगा
पढ़-लिखकर बापू मैं भी
नील-गगन पर चमकूंगी
समानता की लाठी से
बुढ़ापे का सहारा बनूँगी
बूझ अक्षरों की पहेली
अपना मुकद्दर आप गढूंगी
गलत धारणाओं को तोड़
उन्नति की नदिया में बहूंगी
ऊंच-नीच,अमीर-गरीब
जाँत-पाँत की खाई को
ज्ञान के भण्डार से भरूंगी
अंगूठे के ठप्पे के साथ मैं
अब न जिऊंगी 
कलम की नोक से एक नवीन
इतिहास रचूंगी
एक नवीन इतिहास रचूँगी
      

Friday, March 18, 2016

चेतना

रातों का चैन दिन की ख़ुशी
रूह का उजाला भाव की नमी
सब चेतना ही तो है
ख्वाहिशें जो दिल के पिंजरे में
जवाँ होती हैं
चाहतें जो नज़रों की चिलमन से
बयाँ होती हैं
ख़्वाबों की तपन आस की पतंग
प्रेम की अगन अंतस का मिलन
सब चेतना ही तो है
जो कभी थमता नहीं वो
मन ही तो है
जो कभी डूबता नहीं वो
संशय ही तो है
भविष्य की सिरहन मन की फिसलन  
यादों की उधड़न रिश्तों की खुरचन
सब चेतना ही तो है    
जो प्रेम बिन तड़पे
वो मन ही तो है
जो फुहार बिन झुलसे
वो मन ही तो  है
मिलन का ख़ुमार मधुमास की बहार
प्यार की बौछार वफ़ा का श्रृंगार
सब चेतना ही तो है
संबंध जो जीवन को
गति देते हैं
कर्त्तव्य जो भटकाव को
मति देते हैं
वादों का ऐतबार चैतन्य की पुकार
क्षमा की फुहार बड़प्पन का दुलार
सब चेतना ही तो है
ईर्ष्या जो संवेदनाओं को
जला देती है
नफ़रत जो शोलों को
हवा देती है
कांटों की चुभन डाल की टूटन
बिछोह की दुखन भरोसे की गलन
सब चेतना ही तो है
  

Thursday, March 10, 2016

तेरी-मेरी सबकी होली

बहुत उड़ाया है सतरंगी इन्द्रधनुष
मुखौटों के साथ
चलो एक होली अंतस की
गहराई से खेलें
वृत्ति को थमायें भाव
की डिबिया
इन्द्रियों को चखायें संवेदनाओं
की गुझिया
चलो एक स्वाद जीवंतता का
चख लेँ
बहायें आनंद का सैलाब
लगायें सौहार्द का गुलाल
चलो विचारों की यातना के बांध
तोड़ कर जीलें
निश्चल प्रेम के पोखर में झूमकर
डूबें
स्वयं के हालात पर मुग्ध हो
रीझें
चलो छल कपट वैमनस्य शत्रुता की
भांग घोंट कर पीलें
उतारें अहम की खुरचन
लगायें धैर्य का उबटन
चलो कालुष की काया को
रगड़कर धोलें
जलायें खण्डित व्यक्तित्व की
होली
सजायें निष्कपट फूलों की
रंगोली
चलो कृष्ण की मुरली भ्रमित अधरों
पर धर लें
समाये फ़ाग नस-नस में
बिखरे गुलाल घर-घर में
चलो एक धुन दिलों के
राग से बुन लें
लगायें अनुराग का चन्दन
मह्काये प्रीत से तन-मन
चलो एक चांदनी का उजाला
उत्सव की मांग में भर लें
     

Sunday, February 7, 2016

हसरतें

कुछ सिमट आये ओस
शुष्क पलकों तले
कुछ टिमटिमाते जुगनू
मैं भी चाहती हूँ
कुछ बिखर जाये चांदनी
ख्वाहिशों के तले
कुछ दुआओं की सौगात
मैं भी चाहती हूँ
ज़िंदगी तेरे पन्नों की कसम
कुछ जुमलों पर दाद
मैं भी चाहती हूँ
न तुम बदलो,न जहाँ बदले
न रुत बदले,न समां बदले
ऐ खुदा, तेरी नेमतों की कसम
बस एक करवट मुक़द्दर
मैं भी चाहती हूँ
खारे पानी में घुल जाये
जो नदिया की तरह
एक बूंद अधरों पर वो बरसात
मैं भी चाहती हूँ
कुछ ठहर जाये वक़्त
मेरी भी ख़ातिर
एक क़तरा उम्मीद
मैं भी चाहती हूँ
ऐ, उजड़े चमन तुझसे
कोई शिक़वा ही नहीं
कुछ सूखे गुलाब
मैं भी चाहती हूँ
एक लहर मचले और
किनारे डूब जायें
कुछ सीपियों की पतवार
मैं भी चाहती हूँ
कुछ राज़ पिघलें और
पर्दे सरक जायें
ऐ, हकीक़त तेरी रोशनी की कसम
कुछ ख़तों की राख़
मैं भी चाहती हूँ
न नमी उछले,न बेचारगी खनके
न संस्कार छिटकेँ,न हौंसला बिखरे
ऐ मन, तेरी चेतना की कसम
वज़ूद की खैरात नहीं
बस खुद से खुद की पहचान
मैं भी चाहती हूँ
एक मुट्ठी आसमान
मैं भी चाहती हूँ
   

Sunday, January 10, 2016

एक हुंकार गौरेया की

जलाकर पंख फूंककर हवस
तुम सोचते हो बुझा दोगे मेरी उड़ान
मैं हौंसले के अंगार में तपी एक रचना हूँ
जिसके हर फ़लसफ़े पर है
दृढ़ इच्छा की मुहर
तुम सोचते हो उड़ेलकर तेजाब अय्याशी का
मिटा दोगे मेरा वज़ूद
ये तन तो महज छलावा है
राख बन उड़ जायेगा एक रोज़
पर आत्मबल से उपजा तेज मेरा
चीर अम्बर का सीना
छन-छन कर बिखरेगा जो इक रोज़
उससे गर्वित होगा ये समाज
तुम सोचते हो लूट आँचल का सम्मान
झुका पाओगे उठी नज़रों का गुमान
मैं छुई-मुई की डाल नहीं जो छूते ही मुर्झा जाऊँ
मैं कोरों की कालिख नहीं जो अश्कों में ही घुल जाऊँ
मैं बदली का चाँद नहीं जो कट्टर दहाड़ से छुप जाऊँ
मैं स्वामिनी हूँ अतुल्य कोख़ की
मैं जननी हूँ सम्पूर्ण जगत की
ऐ, लगाम से छूटे घोड़े थम जा
कहीं ऐसा न हो ! मैं धारा की विपरीत दिशा में बह जाऊँ
धर रूप चण्डिका का प्रलय का रस-पान कर जाऊँ
और तुम्हारी अंधी-कामना को
इतिहास में दफ़न कर जाऊँ
              

Tuesday, January 5, 2016

एक कोशिश

क्यूँ न ग़म के अलाव तले
रूह को तापा जाये
शायद एक नज़्म का आगाज़ हो जाये
क्यूँ न भटकाव के मोती
अलगाव के समुन्दर से बीने जाये
शायद ह्रदय शुद्ध हो जाये
क्यूँ न तन्हाई के दामन पर
सूखी यादों को बिखेरा जाये
शायद भविष्य महक जाये
क्यूँ न फैसलों के अधिकार को
मांग में उकेरा जाये
शायद सुनहरी धूप खिल जाये
क्यूँ न बदली के आगोश तले
लुप्त सितारों को पुकारा जाये
शायद दीदारे चाँद हो जाये
क्यूँ न संदेह की घाघर में
रंग केसरिया घोला जाये
शायद प्रेम छलक जाये
क्यूँ न सरहदों की बेग़ानियत में
तेज़ाब अपनीयत का उड़ेला जाये
शायद लोहा पिघल जाये
क्यूँ न समानता की कटार से
असमानता की बेडियों को काटा जाये
शायद रंग लाल हो जाये
क्यूँ न एक तीर भरोसे का
विश्वास के तरकश से छोड़ा जाये
शायद जिगर के पार हो जाये

Saturday, December 26, 2015

एक ख़्वाहिश

काश ! पलट जाती बाजी शतरंज की
और तक़दीर के मोहरों ने चल दी होती
एक शातिर चाल
हम भी जीत जाते एक पाक रूह
और बिछा देते प्रेम के धरातल पर
दिल की बिसात
मगर क्या करें ? कुछ मुकद्दर था गद्दार
कुछ कमी थी भेजे में
भाँप ही नहीं पाये हक़ीक़त के मोहरे
और फ़ना हो गयीं खुशियाँ
शह और मात के चक्रव्यूह में फंसकर
बहुत आसानी से घिर गया
गलत पाले में फड़फड़ाता वज़ूद
अब किसके कानों में पिघलाएं लावा
सब हैं स्वार्थ-प्रदूषण के शिकार
कोई किसी के दर्द में होकर शुमार
खोना नहीं चाहता अपना ऐतबार
सच की आँखों में बाँधकर पट्टी
देखना चाहते हैं सभी सतरंगी इन्द्रधनुष
और सेंकना चाहते हैं सुनहरी धूप
उगते सूर्य को देकर अर्ध्य मतलबखोरी का
डूबते सूर्य से पीछा छुड़ाना चाहते हैं सब
क्योंकि यह मतलब से बुना संसार है
यहाँ भावनाओं को पिरोना बिल्कुल बेकार है
यहाँ भावनाओं को पिरोना.............................................|