कब बिखर जाये रेत की तरह जिंदगी
ये तो बस इक लम्हे की बात होती है
कितना भी समझ लो खुद को कश्तीबाज़ तुम
पतवार तो बस उसी के हाथ होती है
कागजों के ढेर पर खड़े कर लो कितने भी अहंकार के महल
इक तीली तो बस उसी के पास होती है
मत दुखाओ दिल किसी मजबूर का तुम
इक आह! बस उस तक पहुँचने की बात होती है
मत समझना हरा दिया है तुमने किसी के एतबार को
उसकी तो हार मे भी जीत की मात होती है
अहम की आग से क्या भड़काओगे शोलों को
उसकी तो तड़प मे भी शबनम की बात होती है
मज़बूर नज़रों को झुकाकर खेलते हो दिल से बहुत
उसकी तो बस एक डोर खीचने की बात होती है
मुखौटे पहनकर महफ़िलों में घूमना आसां है बहुत
उसकी तो परछाईं भी आईने को ललकार होती है
चौड़े कंधे न उठा पाएंगे वीरानियों,बेड़ियों,जिल्लतों का बोझ
उसके लिए तो ये आँचल की सौगात होती है
मत फेंको कंकड़ कोई हलचल अब उथल कर बाहर आएगी नहीं
ये तो रेत के पानी में बैठ जाने की बात होती है
बेवफाइयों पर पर्दा डालो या गुनाहों का इसरार करो
ये तो बस निगाहों से उतर जाने की बात होती है
अहसानों से तपी मिट्टी की हो या हो सोने की छत
उसके लिए तो बस सर छुपाने की बात होती है
जख्म देकर खुरचना उसकी आदत मे है शुमार
उसकी समझ में तो ये बस इक आदत की बात होती है
तुम कभी उनकी तरह भीतर न घुस पाओगी
ये तो बस नसों में दौड़ते खूं की रफ़्तार होती है
यूँही बेफिक्र अंदाज न रख ऐ अमिता
उसके लिए तो ये कर गुजरने की बात होती है
ये तो बस इक लम्हे की बात होती है
कितना भी समझ लो खुद को कश्तीबाज़ तुम
पतवार तो बस उसी के हाथ होती है
कागजों के ढेर पर खड़े कर लो कितने भी अहंकार के महल
इक तीली तो बस उसी के पास होती है
मत दुखाओ दिल किसी मजबूर का तुम
इक आह! बस उस तक पहुँचने की बात होती है
मत समझना हरा दिया है तुमने किसी के एतबार को
उसकी तो हार मे भी जीत की मात होती है
अहम की आग से क्या भड़काओगे शोलों को
उसकी तो तड़प मे भी शबनम की बात होती है
मज़बूर नज़रों को झुकाकर खेलते हो दिल से बहुत
उसकी तो बस एक डोर खीचने की बात होती है
मुखौटे पहनकर महफ़िलों में घूमना आसां है बहुत
उसकी तो परछाईं भी आईने को ललकार होती है
चौड़े कंधे न उठा पाएंगे वीरानियों,बेड़ियों,जिल्लतों का बोझ
उसके लिए तो ये आँचल की सौगात होती है
मत फेंको कंकड़ कोई हलचल अब उथल कर बाहर आएगी नहीं
ये तो रेत के पानी में बैठ जाने की बात होती है
बेवफाइयों पर पर्दा डालो या गुनाहों का इसरार करो
ये तो बस निगाहों से उतर जाने की बात होती है
अहसानों से तपी मिट्टी की हो या हो सोने की छत
उसके लिए तो बस सर छुपाने की बात होती है
जख्म देकर खुरचना उसकी आदत मे है शुमार
उसकी समझ में तो ये बस इक आदत की बात होती है
तुम कभी उनकी तरह भीतर न घुस पाओगी
ये तो बस नसों में दौड़ते खूं की रफ़्तार होती है
यूँही बेफिक्र अंदाज न रख ऐ अमिता
उसके लिए तो ये कर गुजरने की बात होती है