Thursday, September 17, 2015

बहुत अहसान किये हैं तुमने

सांसे कैद करके खुदगर्जी के पिंजरे में
तुम कहते हो उन्मुक्त उड़ान के पंख
दिए हैं तुम्हे
जिन्दा दफ़न करके इस मिट्टी की काया को
भावनाओं के रेगिस्तान में
तुम कहते हो खुला आकाश निहारने को स्वप्न
दिए हैं  तुम्हे
अतृप्त अभिलाषाओं को सीने से बाहर
झाँकने भी नहीं देते
प्रकाश का एक पुंज हृदय के धरातल पर
प्रज्जवलितं होने भी नहीं देते
कहते हो सुनहरी मांग सजाने को
तेजस्वी पुंज दिए हैं तुम्हे
नाम देकर एक शक्ति का मुझको
बेबस और लाचारी की कुटिया में बैठाकर
नैतिकता और धर्म का पाठ पढ़ाकर
खींचकर लक्ष्मण-रेखा का आश्रय
तुम कहते हो कस्तूरी- मृग
दिए है तुम्हे
स्वर्ग और पृथ्वी के बीच संपूर्ण आकाश है तुम्हारा
दम्भ-मान से अधिभूत इस बलशाली काया का
समाज गुलाम है तुम्हारा
दो बूँद चाहत से व्याकुल इस लचकती डाली में
ममता का फूल खिलाकर
झुकी-सहमी, थरथराती  पहचान थमाकर
तुम कहते हो लहलहाने को वायु के भण्डार
दिए हैं तुम्हे            

Saturday, September 12, 2015

काश ऐसा हो जाए

भूला -भटका एक चाहत का पल
कहीं से खाली तमन्नाओं की झोली में
चुपके से आ  जाये
हर्षित घुंघरूओं  की झंकार
उदास नीरस -जीवन को
फिरकनी सा नचा जाए
सतरंगी बहार से महक जाए
दुखी आँचल
ख़ुशियों के श्रृंगार से लरज जाए
मदमस्त यौवन
नेह की बौछार से भीग जाए
द्रवित तन-मन
बादलों के पार पहुँच जाए
मूक-समर्पण
टूटकर बिखर जाए अहम में
पिरोया वज़ूद
तुम्हारे भीतर खो जाए
ये देह ये  रूप
खामोश हो जायें  ये लब
खामोश हो जाए ये हठ
उठाकर रख दूं मैं  भी नाज़-गुमान
एक कोने में
उठाकर रख दो तुम भी अहंकार-दौलत
एक कोने  में
मैं भी खाली, तुम भी खाली
बस एक चाहत की कशिश
दोनों के दिलों की तिजोरी
भर जाए
बेनूर तन्हाई की रातों को
खिलखिलाती चाँदनी से
नहला जाय्रे   
काश एक भूला-भटका चाहत का पल
कहीं  से आ जाए    
स्याह-सफ़ेद मायूसियों के पन्नों को
रंगीन लम्हों से सजा जाए
काश...............................


















Friday, September 11, 2015

बुझी राख

थक गयी हूँ बहुत 
ख़ुद की आज़माइश करते-करते
भावना-हीन वृक्ष की जड़ों
को अश्क़ों से सींचते-सीचते
बहुत दूर् निकल आयी हूँ
एक रिश्ता निभाते-निभाते
इक जिस्म घसीट लायी हूँ
इक दाग छुपाते-छुपाते
चुक  गयी हूँ  बहुत 
एक डर पालते-पालते 
टूट गयी हूँ  बहुत 
एक पहचान सँभालते-सँभालते   
रह गया है बस एक रीतापन 
बचा खजाना खंगालते-खंगालते 
गुम  हो गया है वजूद
खुद को तलाशते-तलाशते 
खुश्क हो गयी है रूह 
एक  बूँद चाहत मांगते-मांगते
सुर्ख हो गई  हैं  हथेलियाँ 
खौलता गुबार  ढांपते -ढांपते  
धुंधली  पड़ गयी है नज़र
भविष्य  का मज़्मून भांपते-भांपते 
पथरा गयी है आँखे 
वफ़ा  का एक पल ताकते-ताकते 
ज़ख़्मी हो गया है विश्वास 
जफ़ा का नासूर  सालते-सालते 
कट गयी है उम्र 
दिलों से कांटे बुहारते-बुहारते 
लड़खड़ा गया है हौसला 
पत्थर-दिल बुत को तराशते-तराशते 
फिसल गयी है रेत  खुशियों की 
बस इक नाम उकारते -उकारते

   
                                                                                                                          

Tuesday, September 8, 2015

बस कुछ वक्त और

बस कुछ वक्त और
वक्त की उंगली थाम
सांसारिक भूल-भुलैया के चक्रव्यूह में
भटकते रहना है
फ़र्ज़ की दहलीज़ पर
कर्तव्य की लाठी टेक
उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते रहना है
बस कुछ वक्त और.............
कुछ ख्वाहिशों से सजाकर
एक छोटा सा नीड़
कुछ मिट्‍टी के सकोरों में
स्नेह से उड़ेलकर
उज्ज्वल भविष्य के
सपनों का नीर
बूँद-बूँद एहसास को
घूँट-घूँट गटकते रहना है
बस कुछ वक्त और........................
रास्ते के पत्थरों को
बुहारकर
चट्टानों के बीच से एक दरिया
निकालकर
मंज़िल को लगन से
तराशकर
अविरल बहती शांत नदी से
प्रेरणा माँगकर
सांसो को जीवन के मोती की माला में
पिरोते रहना है
बस कुछ वक्त और................
कुछ यादें गुजरे पलों की
बगिया से सींचकर
कुछ पुराने ख़त दिल के
तहखाने से ढूँढकर
कुछ ख्वाब रेत के दामन
में उकेरकर
चाँदनी रात का उजाला विचलित मन के
पोरों में भरते रहना है
बस कुछ वक्त और....................
आत्म-बल की शक्ति से
मुश्किलों को जीतकर
क्षमा के दान से आत्मा को
खंगालकर
संतोष और धैर्य से
रिश्तों को सँवारकर
इस तुच्छ-देह को इन अमूल्य गुणों से
अलंकृत करते रहना है
बस कुछ वक्त और.........................
संकल्पित ताप से इस देह को
तपाकर
यश की बौछार से प्रियजनों
को भिगाकर
गुमनाम भीड़ में एक अलग
पहचान बनाकर
अमृत और मृत्यु के स्वाद को
चखते रहना है
बस कुछ वक्त और.......................