बुंदेले हरबोलों की धरती पर गूँजी
एक खेल प्रेमी की गर्वीली जवानी थी
बस इक हॉकी की छड़ी से उसने
फिरंगियों के छक्के छुड़ाने की ठानी थी
न तीर न तलवार,न गोलियों की बौछार से
फिरंगियों को धूल चटाई उसने
बस हॉकी की ललकार से
ध्यान सिंह था नाम उसका
गंगा की पावन भूमि इलाहाबाद था
जन्म निवास उसका
२९ अगस्त सन१९०५ को ब्रह्माण्ड से
एक तारा जमीं पर उतर आया था
मूल सिंह व रूप सिंह दो भाइयों के बीच
जिसने अपना स्थान पाया था
रानी लक्ष्मीबाई वीरांगना की धरती पर
उसका परिवार बस आया था
झाँसी के फीरोज मैदान की चरण-धूलि
का तिलक जिसने अपने माथे पर लगाया था
इक लकड़ी के डंडे से उसने क्या
कमाल कर दिखाया था
हिटलर जैसे तानाशाह का भी सर
उसने अपने कदमों पर झुकाया था
उसके हाथ पर पहुँच कर हॉकी
कृष्ण की मुरली बन जाती थी
गेंद तो जैसे गोपियाँ थी
जो रास उसके संग रचाती थी
पलक झपक भी न पाए तब तक
गेद गोल तक पहुँच जाती थी
भरे हुए मैदान को तालियों से
गुंजायमान कर जाती थी
तीन ओलम्पिक जीत उसने
ब्रिटिश के सीने पर बिगुल बजायी थी
स्वर्ण अक्षरों में लिखकर भारत की जीत
इतिहास में दर्ज करायी थी
हिटलर जैसे तानाशाह ने तब उसकी
हॉकी की जांच करायी थी
जूतों में है जादू इसके यह कहकर
उसके खेल पर संदेह की मुहर लगायी थी
पैरों से ठोकर मार जूतों को उसने
नई हॉकी के साथ नंगे पाँव ही
जर्मनी का सिंहासन हिला दिया
एतिहासिक विजय हासिल कर
हिन्दुस्तानी साहस का दंभ दिखा दिया
तब हिटलर ने जर्मनी की नागरिकता
और सेना में फील्ड मार्शल
का ओहदा देने का हुक्म सुना दिया
मगर उस जाँबाज़ खेल के सिपाही ने
देश से गद्दारी का प्रस्ताव
तुरंत ही ठुकरा दिया
और भारत माता के दूध का कर्ज़ अदा किया
सेना में लांस-नायक की मामूली सी
तनख्वाह पर वह परिवार का
भरण-पोषण करता था
मगर हॉकी के सम्मान को वह
फांको में भी बचाकर रखता था
पूरे खेल के जीवन में उसने
एक हज़ार से भी ज्यादा गोलों
का तोहफा संसार को दिया
और हॉकी के खेल को उसने
जन-जन के हृदय में बसा दिया
3 दिसंबर सन् 1979 को फिर इस
महान हस्ती ने हॉकी के भविष्य की
चिंता आँखों में लिए इस संसार से कूंच किया
इस कथा को सुनकर जवान खून तुम
हॉकी के निर्माण कर्ता पर नाज़ करो
जिस खिलाड़ी के आगे ब्रिटिश ताकत
तक ने शीश झुकाया था
लोभ,मोह-सत्ता,ऊँचा ओहदा,देश-द्रोह
की जंजीरों में जो कभी जकड़ न पाया था
कठोर तपस्या से बॉल को हॉकी से चिपकाकर
जो 'हॉकी का जादूगर' कहलाया था
और ध्यान सिंह से 'ध्यान चंद' उपनाम पाकर
जो चाँद को जमी पर उतार लाया था
ऐसे महान खिलाड़ी की धुंधली हो
चुकी तस्वीर की धूल तुम्हारी आँखों
से हटानी थी इसलिए ये कथा सुनानी थी
इसलिये ये कथा सुनानी थी -------
एक खेल प्रेमी की गर्वीली जवानी थी
बस इक हॉकी की छड़ी से उसने
फिरंगियों के छक्के छुड़ाने की ठानी थी
न तीर न तलवार,न गोलियों की बौछार से
फिरंगियों को धूल चटाई उसने
बस हॉकी की ललकार से
ध्यान सिंह था नाम उसका
गंगा की पावन भूमि इलाहाबाद था
जन्म निवास उसका
२९ अगस्त सन१९०५ को ब्रह्माण्ड से
एक तारा जमीं पर उतर आया था
मूल सिंह व रूप सिंह दो भाइयों के बीच
जिसने अपना स्थान पाया था
रानी लक्ष्मीबाई वीरांगना की धरती पर
उसका परिवार बस आया था
झाँसी के फीरोज मैदान की चरण-धूलि
का तिलक जिसने अपने माथे पर लगाया था
इक लकड़ी के डंडे से उसने क्या
कमाल कर दिखाया था
हिटलर जैसे तानाशाह का भी सर
उसने अपने कदमों पर झुकाया था
उसके हाथ पर पहुँच कर हॉकी
कृष्ण की मुरली बन जाती थी
गेंद तो जैसे गोपियाँ थी
जो रास उसके संग रचाती थी
पलक झपक भी न पाए तब तक
गेद गोल तक पहुँच जाती थी
भरे हुए मैदान को तालियों से
गुंजायमान कर जाती थी
तीन ओलम्पिक जीत उसने
ब्रिटिश के सीने पर बिगुल बजायी थी
स्वर्ण अक्षरों में लिखकर भारत की जीत
इतिहास में दर्ज करायी थी
हिटलर जैसे तानाशाह ने तब उसकी
हॉकी की जांच करायी थी
जूतों में है जादू इसके यह कहकर
उसके खेल पर संदेह की मुहर लगायी थी
पैरों से ठोकर मार जूतों को उसने
नई हॉकी के साथ नंगे पाँव ही
जर्मनी का सिंहासन हिला दिया
एतिहासिक विजय हासिल कर
हिन्दुस्तानी साहस का दंभ दिखा दिया
तब हिटलर ने जर्मनी की नागरिकता
और सेना में फील्ड मार्शल
का ओहदा देने का हुक्म सुना दिया
मगर उस जाँबाज़ खेल के सिपाही ने
देश से गद्दारी का प्रस्ताव
तुरंत ही ठुकरा दिया
और भारत माता के दूध का कर्ज़ अदा किया
सेना में लांस-नायक की मामूली सी
तनख्वाह पर वह परिवार का
भरण-पोषण करता था
मगर हॉकी के सम्मान को वह
फांको में भी बचाकर रखता था
पूरे खेल के जीवन में उसने
एक हज़ार से भी ज्यादा गोलों
का तोहफा संसार को दिया
और हॉकी के खेल को उसने
जन-जन के हृदय में बसा दिया
3 दिसंबर सन् 1979 को फिर इस
महान हस्ती ने हॉकी के भविष्य की
चिंता आँखों में लिए इस संसार से कूंच किया
इस कथा को सुनकर जवान खून तुम
हॉकी के निर्माण कर्ता पर नाज़ करो
जिस खिलाड़ी के आगे ब्रिटिश ताकत
तक ने शीश झुकाया था
लोभ,मोह-सत्ता,ऊँचा ओहदा,देश-द्रोह
की जंजीरों में जो कभी जकड़ न पाया था
कठोर तपस्या से बॉल को हॉकी से चिपकाकर
जो 'हॉकी का जादूगर' कहलाया था
और ध्यान सिंह से 'ध्यान चंद' उपनाम पाकर
जो चाँद को जमी पर उतार लाया था
ऐसे महान खिलाड़ी की धुंधली हो
चुकी तस्वीर की धूल तुम्हारी आँखों
से हटानी थी इसलिए ये कथा सुनानी थी
इसलिये ये कथा सुनानी थी -------