Monday, August 31, 2015

एक सलामी हाकी के "जादूगर मेजर ध्यान चंद" मेरे नानाजी को

बुंदेले हरबोलों की धरती पर गूँजी
एक खेल प्रेमी की गर्वीली जवानी थी
बस इक हॉकी की छड़ी से उसने
फिरंगियों के छक्के छुड़ाने की ठानी थी

न तीर न तलवार,न गोलियों की बौछार से
फिरंगियों को धूल चटाई उसने
बस हॉकी की ललकार से

ध्यान सिंह था नाम उसका
गंगा की पावन भूमि  इलाहाबाद था
जन्म निवास उसका

२९ अगस्त सन१९०५ को ब्रह्माण्ड से
एक तारा जमीं पर उतर आया था
मूल सिंह व रूप सिंह दो भाइयों के बीच
जिसने अपना स्थान पाया था

रानी लक्ष्मीबाई वीरांगना की धरती पर
उसका परिवार बस आया था
झाँसी के फीरोज मैदान की चरण-धूलि
का तिलक जिसने अपने माथे पर लगाया था

इक लकड़ी के डंडे से उसने क्या
कमाल कर दिखाया था
हिटलर जैसे तानाशाह का भी सर
उसने अपने कदमों पर झुकाया था

उसके हाथ पर पहुँच कर हॉकी
कृष्ण की मुरली बन जाती थी
गेंद तो जैसे गोपियाँ थी
जो रास उसके संग रचाती थी

पलक झपक भी न पाए तब तक
गेद गोल तक पहुँच जाती थी
भरे हुए मैदान को तालियों से
गुंजायमान कर जाती थी

तीन ओलम्पिक जीत उसने
ब्रिटिश के सीने पर बिगुल बजायी थी
स्वर्ण अक्षरों में लिखकर भारत की जीत
इतिहास में दर्ज करायी थी

हिटलर जैसे तानाशाह ने तब उसकी
हॉकी  की जांच करायी थी
जूतों में है जादू इसके यह कहकर
उसके खेल पर संदेह की मुहर लगायी थी

पैरों से ठोकर मार जूतों को उसने
नई हॉकी के साथ नंगे पाँव ही
जर्मनी का सिंहासन  हिला दिया
एतिहासिक विजय हासिल कर
हिन्दुस्तानी साहस का दंभ दिखा दिया

तब हिटलर ने जर्मनी की नागरिकता
और सेना में फील्ड मार्शल
का ओहदा देने का हुक्म सुना दिया
मगर उस जाँबाज़ खेल के सिपाही ने
देश से गद्दारी का प्रस्ताव
तुरंत ही ठुकरा दिया
और भारत माता के दूध का कर्ज़ अदा किया

सेना में लांस-नायक की मामूली सी
तनख्वाह पर वह परिवार का
भरण-पोषण करता था
मगर हॉकी  के सम्मान को वह
फांको में भी बचाकर रखता था

पूरे खेल के जीवन में उसने
एक हज़ार से भी ज्यादा गोलों
का तोहफा संसार को दिया
और हॉकी  के खेल को उसने
जन-जन के हृदय में बसा दिया

3 दिसंबर सन् 1979 को फिर इस
महान हस्ती ने हॉकी  के भविष्य की
चिंता आँखों में लिए इस संसार से कूंच किया

इस कथा को सुनकर जवान खून तुम
हॉकी  के निर्माण कर्ता पर नाज़ करो

जिस खिलाड़ी के आगे ब्रिटिश ताकत
तक ने शीश झुकाया था
लोभ,मोह-सत्ता,ऊँचा ओहदा,देश-द्रोह
की जंजीरों में जो कभी जकड़ न पाया था

कठोर तपस्या से बॉल  को हॉकी  से चिपकाकर
जो 'हॉकी  का जादूगर' कहलाया था
और ध्यान सिंह से 'ध्यान चंद' उपनाम पाकर
जो चाँद को जमी पर उतार लाया था

ऐसे महान खिलाड़ी की धुंधली हो
चुकी तस्वीर की धूल तुम्हारी आँखों
से हटानी थी इसलिए ये कथा सुनानी थी
इसलिये ये कथा सुनानी थी -------





Friday, August 21, 2015

विदाई की रीत

जो अठखेलियाँ करती थी कभी
विस्तृत आकाश में
स्वप्न सजीले बुनती थी कभी
तारों की छाँव में
लुका- छुपी खेलती थी कभी
काली-घनी बदलियों के साम्राज्य में
गरजता बादल भी कभी जिसकी मोहक मुस्कान से
पिघल जाया करता था
सूरज का तेज़ भी कभी जिसके आगे फीका
पड़ जाया करता था
ठंडी पुरवाई जिसकी जुल्फें
संवारा करती थी
चंदा की चांदनी भी जिसका
रूप निहारा करती थी
आज सावन में भीगे गीतों के साथ
हो रही है उसकी विदाई
हाय ! रे विधाता, ये क्या रीत तुमने बनाई
अम्बर की रानी मिट्टी से उपजे राजमहल में
बसने को आई
एक थरथराता पत्ता क्या संभाल पायेगा
उसका अस्तित्व
या मिट्टी में मिल जायेगा कुंवारे सपनों
का संगीत
इतनी गहरी हो चुकी जड़ों का परिवेश
उस पत्ते से छूट न पायेगा
तब उस बूँद का अस्तित्व ही अपनी
पहचान खो जायेगा
उसकी उन्मुक्त-खनकती हंसी का बोझ
ये विशाल पुरातन-वृक्ष न उठा पायेगा
बांधकर उसको हजारों रीति-रिवाज़ों
की बेलों से
सांस लेने का अधिकार भी उससे
छिन जायेगा
उनकी इच्छाओं के बोझ-तले रूप का
कमल कुम्हला जायेगा
दम तोड़ती हसरतों की नदिया को
समुन्दर का वेग पी जायेगा
काली- घटा का नीर भी मन की उदासी को
न धो पायेगा
तालाब का मालिक भी याचना से निहारते
शुष्क अधरों को इक बूँद अमृत-सुधा की
 न दे पायेगा
रूढ़ियों का इतिहास धुरी का चक्र न बदल पाया है
न बदल पायेगा
पथराई आँखों को समानता का अधिकार अभी और
इंतज़ार करवाएगा
परिवर्तन का देवता अभी और बलि चढ़वाएगा
परिवर्तन का देवता ..................................
 

   
                    

Friday, August 14, 2015

संकुचित मन

अम्बर से उठाकर बदली का एक टुकड़ा
तुम दे नहीं सकते
चूमकर नैनों के कोरों से
भीगे हुए अहसास का एक क़तरा
तुम दे नहीं सकते
आँखों मे  छुपाकर बीते लम्हों का अँधेरा
भोर की किरनों से नहायी
अतीत की एक पँखुड़ी का सवेरा
तुम दे नहीं सकते
राग-द्वेष की कलाकृतियाँ मिटाकर ह्रदय से
स्नेह के रंगों में डूबा
आत्मीयता का एक कैनवास
तुम दे नहीं सकते
निश्चल-प्रेम से निहारती एक निरीह बूँद को
समर्पण के आलिंगन में जकड़कर
मोती बनाने का वैभव
तुम दे नहीं सकते
संशय-रहित विश्वास से ह्रदय के तारों को
छेड़कर इक नवीन-मधुर धुन का संगीत
भविष्य की धड़कनों को
तुम दे नहीं सकते
टूटते तारों से माँगा हुआ सात- जन्मों का साथ
हवन-कुण्ड की राख से भरकर मांग का उल्लास
चुटकी भर विश्वास का अहसास
तुम दे नहीं सकते
पल-पल बिखरते-झरते हरसिंगार के पल
बीनकर दामन में सहेजकर महकती खुशबुओं से
प्रफुल्लित होकर
दो घड़ी चैन से साँसों को गिनने का मधुमास
तुम दे नहीं सकते
एक थपकी मनुहार की एक समर्पण प्रेम का
एक कशिश चाहत की बस एक पुकार मेरे नाम की
एक ख्वाहिश तुम्हारी आँखों से चाँद  गटकने की
इन अतृप्त अभिलाषाओं का एतबार
तुम दे नहीं सकते
रेशमी धागों से छुपाया हुआ उधड़े रिश्तों का पैबंद
मखमली कालीन से लिपटा हुआ विरह की वेदना का सच    
हठीले मन से अधिभूत अहंकार का व्यक्तित्व
दम तोड़ते शीश-महल को एक बूँद अमृत-सुधा की
तुम दे नहीं सकते
 


     
       





Monday, August 3, 2015

मनः-स्तिथी का विश्लेषण


उम्र बूढ़ी हो जाएगी
हसरतें कुम्हला जायेंगी
उम्मीदें धुंधली पड़ जायेंगी
मगर नफ़रत जवानी का दामन
न छोड़ पाएगी
शक की कच्ची बौर वक़्त के साथ
और परिपक्व होती जाएगी
उजली चांदनी विरह की काई को
ढक देगी मगर
मन के धरातल से
उखड़ न पाएगी
विश्वास-अविश्वास के द्वंदों से
मुक्त हो आत्मा
उलझी गाँठों के पट
न खोल  पाएगी
न सूर्य दे पायेगा उस अंधे हो चुके
अहसास को प्रकाश
न चांदनी ही चमका पाएगी उसकी हठीली
परतों की कयास
अग्नि भी न जला पाएगी उसका
सूखे पत्तोंकी तरह
फड़फड़ाता जर्जर अंधविश्वास
समय की नदी यूँ ही शांत,स्थिर
मूक प्रेम की बाढ़
नैनों में लिए अतृप्त-कामनाओं के
बाँध तोड़ती जायेंगी
पुरातन जख्म से लवालब वृक्ष
विस्तार को
प्राप्त होता जाएगा
मन का अटल अंध- विश्वास दृढ़ता से
जड़ों में घुलता जाएगा
नेह का कोई भी शस्त्र उस अहंकारी
फलते-फूलते वृक्ष की डालिओं को
काट न पायेगा
समय का चक्र भूत को पीछे छोड़
अतीत को निहारता
भविष्य के गर्भ में
समाता जाएगा
ह्रदय का रीतापन
रीता ही रह जाएगा
       

Saturday, August 1, 2015

हारती कोशिश

एहले गुरूर मैंने कितने सावन तेरी नज़र कर दिए
इस दिल को बारिश में भीगने का अधिकार न था
मैं नज़रों के तीर लिए उम्र भर बैठी रही
कोई भी निशाना उसके सीने के पार न था
उसके दिल मे सुराख करके मोहब्बत को निकाल लाये
मेरा कोई भी खंज़र इतना धारदार न था
उसने ले रखे हैं बेशुमार मोहब्बतों के उधार गैरों से
तभी वो मेरी वफ़ा का कर्ज़दार न था
मैंने कभी घर छोड़ा नही उसने कभी रोका नहीं
इतना ज़हर पी जाउंगी मैं  हालात ने कभी सोचा न था
वो बना रहा उम्रभर गैरों का ही खिदमदगार
उसे मेरी वफ़ा पर कभी एतबार न था
अब तो ख़्वाबों ने भी उम्मीदों का दामन छोड़ दिया हैं
टूटते सितारों को कभी अम्बर को तकना न था