Friday, July 31, 2015

भर्म का ज़ुनून


रहस्यमयी समुन्दर उफान का सच
भाँपने नहीं देता
बेफिक्र वज़ूद आईने के भीतर
झाँकने नहीं देता
हठीला अन्तःकरण रिश्तों की गाँठ
खोलने नहीं देता
मन का संयम इन्द्रियों को
भटकने नहीं देता
कर्म का सिद्धांत देह के स्वाभिमान को
त्यागने नहीं देता
परिणाम का इन्तजार मायुसीओं का द्वार
बंद होने नहीं देता
अनिष्ट का डर आस्था की शमा
बुझने नहीं देता
ये हार का मंज़र तिरस्कार का दर्पण
टूटने नहीं देता
धुरी का चक्र कामनाओं का बहाव
रुकने नहीं देता
ख्याति का लोभ नर को नारायण
बनने नहीं देता
शक का चूल्हा प्रेम की रोटियां
सिकने नहीं देता
बासी प्रेम अपनीयत का स्वाद
चखने नहीं देता
कोई तीसरा दो दिलों को एक
होने नहीं देता
अधपका रिश्ता जीवन में उल्लास
घुलने नहीं देता
कान का कच्चापन सच्चाई का पैमाना
मापने नहीं देता
विश्वास की सड़न प्रेम के अंकुर
फूटने नहीं देती
पाखण्ड की कश्ती द्वेष का सूरज
डूबने नहीं देती
अंधी श्रद्धा सच्चाई की कलम का ढक्कन
खुलने नहीं देती
भर्म की तपिश नफरतों की बदली
छटनें नहीं देती
मोहरों की चाल बाज़ी का रुख
पलटने नहीं देती
लकीरों की हथेली लिखा हुआ फलसफा
मिटने नहीं देती  
उम्र की नदी धाराओं की गति को
थमने नहीं देती  
फिसलती हथेली दौलतों-शोहरतों की मुट्ठी
भींचने नहीं देती
मौत की आंधी एक तिनका भी अपने साथ
उड़ाने नहीं देती   

Wednesday, July 29, 2015

समझने की समझ

कब बिखर जाये रेत की तरह जिंदगी
ये तो बस इक लम्हे की बात होती है
कितना भी समझ लो खुद को कश्तीबाज़ तुम
पतवार तो बस उसी के हाथ होती है
कागजों के ढेर पर खड़े कर लो कितने भी अहंकार के महल
इक तीली तो बस उसी के पास होती है
मत दुखाओ दिल किसी मजबूर का तुम
इक आह! बस उस तक पहुँचने की बात होती है
मत समझना हरा दिया है तुमने किसी के एतबार को
उसकी तो हार मे भी जीत की मात होती है
अहम की आग से क्या भड़काओगे शोलों को
उसकी तो तड़प मे भी शबनम की बात होती है
मज़बूर नज़रों को झुकाकर खेलते हो दिल से बहुत
उसकी तो बस एक डोर खीचने की बात होती है
मुखौटे पहनकर महफ़िलों में घूमना आसां है बहुत
उसकी तो परछाईं भी आईने को ललकार होती है
चौड़े कंधे न उठा पाएंगे वीरानियों,बेड़ियों,जिल्लतों का बोझ
उसके लिए तो ये आँचल की सौगात होती है
मत फेंको कंकड़ कोई हलचल अब उथल कर बाहर आएगी नहीं
ये तो रेत के पानी में बैठ जाने की बात होती है
बेवफाइयों पर पर्दा डालो या गुनाहों का इसरार करो
ये तो बस निगाहों से उतर जाने की बात होती है
अहसानों से तपी मिट्टी की हो या हो सोने की छत
उसके लिए तो बस सर छुपाने की बात होती है
जख्म देकर खुरचना उसकी आदत मे है शुमार
उसकी समझ में तो ये बस इक आदत की बात होती है
तुम कभी उनकी तरह भीतर न घुस पाओगी
ये तो बस नसों में दौड़ते खूं की रफ़्तार होती है
यूँही बेफिक्र अंदाज न रख ऐ अमिता
उसके लिए तो ये कर गुजरने की बात होती है

 


   

Tuesday, July 21, 2015

आस की प्यास

हम धोखे के खंजर
अपनी पीठ पर खाए बैठे हैं
कहीं उड़ न जाएं उसकी
बेवफाइयों के चर्चे
हम खामोशियों के दरिया में
खुद को डुबोये बैठे हैं
चेहरे पर मुस्कराहट का
नकाब डाल निकलते हैं घर से
कही उफन न जाये गालों पर
गम का सागर हम दिल के
जज़्बातों को चट्टानों से टकराये बैठे हैं
भीतर की उदासी कहीं खोल न दे
तहखानों की कुण्डी हम दिल की
हसरतों पर पहरा लगाये बैठे हैं
गलतफहमियों का जंगल भड़का न दे
कही नफरत के शोलों को
हम बारिश की बूंदों को
पलकों पर संजोएं बैठे हैं
तू न सही तेरा अक्स ही सही
हम पिघलती मोम को हथेलियों
में छुपाये बैठे हैं
जलते हुए अरमानो से
पिघल जायेगा हिमालय
इसी उम्मीद का दिया चौखट
पर जलाये बैठे हैं
हम चाहत की लकड़ी से
उम्र का चूल्हा जलाये बैठे है
कभी तो पकेंगी मोहब्बत की रोटियां
हम अरमानों का थाल सजाये बैठे हैं 

Sunday, July 19, 2015

मैं कविता कहती हूँ

मैं भारी- भरकम शब्दों से
अहसासों को नहीं तोलती
मैं ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर
विचारों को नहीं मोड़ती
मैं गहराई के समुन्दर मे
डूब-डूबकर अक्षरों को नहीं बीनती
मैं व्याकरण के गूढ़ रहस्य
की परतों को खुरच-खुरच
कर नहीं खुरचती
मैं जज़्बातों के दरियाँ में
मन को उतराये रहती हूँ
मैं खुशियों की खाली झोली को
अल्फ़ाज़ों की भेंट चढ़ाये रहती हूँ
मैं बाहर के कोलाहल से विमुक्त हो
भीतर के शोर का बिगुल बजाये रहती हूँ
मैं आस-पास के सजीव-चित्रण को
मन के श्याम-पटल पर उकराये रहती हूँ
मैं सामाजिक परिवेश से उपजे नन्हें पौधों
का सजीव-चित्रण दर्शाये रहती हूँ
मैं मन के दर्पण में झांक-झांककर
व्यथा,कुंठा,मजबूरी की हताशा का
चेहरा समाज के रचयिता को दिखाए रहती हूँ
मैं कागज़ और कलम से मथ-मथकर
सोच का समुन्दर आशा की कुछ बूंदे
निराशा की लपटों से झुलसे तन-मन
पर बरसाए रहती हूँ
उनके अनमोल समय से कुछ पल चुराए रहती हूँ
हाँ मैं कविताएं कहती हूँ................



   
 


  

Monday, July 13, 2015

छुपा ज़मीर

उसकी नज़र बहुत कुछ बोलती है
मै उसकी नज़रों से खुद को बचाये
घूमती रहती हूँ
उसके खामोश लबों से फूटकर
बाहर न आ जाएँ
ढके-मुदे गहरे राज़
जो बहुत समय से वो
अपने कंधे पर ढोये जी रहा है
एक बनावटी जिंदगी
कहीं थक न जाए उसका चेहरा
मुखौटा पहने-पहने
मै उसके असली चेहरे को
भूल चुकी हूँ
इसीलिए छुपा दिए हैं
सब आईने अतीत के मैंने
कुछ वक़्त और गुजर जाए
ऐसे ही अनजान बनकर
गर पहचान हो गयी तो
मै सचमुच बिखर जाऊगीं
किसी टूटे हुए घुंघुरू की तरह