Saturday, December 26, 2015

एक ख़्वाहिश

काश ! पलट जाती बाजी शतरंज की
और तक़दीर के मोहरों ने चल दी होती
एक शातिर चाल
हम भी जीत जाते एक पाक रूह
और बिछा देते प्रेम के धरातल पर
दिल की बिसात
मगर क्या करें ? कुछ मुकद्दर था गद्दार
कुछ कमी थी भेजे में
भाँप ही नहीं पाये हक़ीक़त के मोहरे
और फ़ना हो गयीं खुशियाँ
शह और मात के चक्रव्यूह में फंसकर
बहुत आसानी से घिर गया
गलत पाले में फड़फड़ाता वज़ूद
अब किसके कानों में पिघलाएं लावा
सब हैं स्वार्थ-प्रदूषण के शिकार
कोई किसी के दर्द में होकर शुमार
खोना नहीं चाहता अपना ऐतबार
सच की आँखों में बाँधकर पट्टी
देखना चाहते हैं सभी सतरंगी इन्द्रधनुष
और सेंकना चाहते हैं सुनहरी धूप
उगते सूर्य को देकर अर्ध्य मतलबखोरी का
डूबते सूर्य से पीछा छुड़ाना चाहते हैं सब
क्योंकि यह मतलब से बुना संसार है
यहाँ भावनाओं को पिरोना बिल्कुल बेकार है
यहाँ भावनाओं को पिरोना.............................................|                        

Thursday, December 17, 2015

हालात का मिलन

तमन्नाओं की झंकार खो गयी है
तन्हाई की भूल-भुलैया में
मुस्कुराहटों की रफ़्तार थम गयी है
उदासी की नैन-लड़ैया में
अश्क़ हमसे मिल ही लेते हैं गले
गम की मौज-मड़ैया में
पीकर प्याला दर्द का थिरकते है जख्म
मायूसियों की नाच-नचैया में
लगाकर बाज़ी फरेब की जीत ही लेते है दिल
वो नैनों के खेल-खिलैया में
खिल ही जाते है कँवल उनकी यादों के
दिले-हूक की ताल-तलैया में
भिगोकर अहसास सोख लेते हैं जाँ
वो वादों की रास-रसैया में
लम्हा-लम्हा बिखर जाते है ख्वाव
गुरूर की हठ-हठैया में
गटककर रुसवाई डूब गए हम
चाहत की राम-रमैया में
          

Monday, December 14, 2015

ये तुमने क्या किया

बनाकर वज़ूद शीशे का
पत्थरों में लाकर छाोड दिया
देकर एक पंख परिंदे का
पिंजरे में लाकर छोड़ दिया
आह को भींचकर बेबसी में
मुस्कुराने को छोड़ दिया
सौंपकर तड़प का दरिया                                                                                      
तन्हा कश्ती में लाकर छोड़ दिया
गुरूरी जंजीर से बांधकर रूह को
आस पिघलाने को छोड़ दिया
स्याह रात से लिखकर तक़दीर
लौ टिमटिमाने को छोड़ दिया
भेदकर एक तीर तिरस्कार का
सर झुकाने को छोड़ दिया
देकर उपनाम वंश-बेल का
रेगिस्तान में लाकर छोड़ दिया
तराशकर दिले ऐतबार
बुत बनाकर छोड़ दिया
जलाकर चिता एक याद की
राख बनाकर छोड़ दिया
पिरोकर रिश्तों के मोती
गैर बनाकर छोड़ दिया
ऐ,कश्ती के खिवैया ये तुमने क्या किया

Saturday, December 5, 2015

कतरा -कतरा ख़ुशी

गर रोशनी न छिटके आफ़ताब की
हम गर्दिशी-अंधेरों में समा जायें
गर आंच न तापें जज्बात की
हम तन्हा ही ठिठुर जायें
चन्द पल जो गुजार आते हैं
दोस्तों के साथ
उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ने को मिल जाता है
इक सीढ़ी का साथ
गर इन्तजार न हो डूबते चाँद का
हम धूप से खिली चाँदनी में फिर कैसे नहायें
बनाकर सिरहाना
सुनहरे पल की कपास का
टिका देते है सारे गम
बोझिल पलकों से
गर रात न सुनाये तराना निःश्चल प्रेम का
हम ख़्वाबों के छल्ले फिर कैसे उड़ायें
अश्कों के समुन्दर में
फ़रियाद की छाँव तले
लो आके बैठ गये हम
मायूसियों को ढांपकर
ठंडी रेत के आगोश तले
गर पवन न दे पाये अपनियत का किनारा
हम डूबते दिल को फिर कैसे बचायें
दिल के तहखाने में समेटकर
बिखरी यादों के पन्नें
भटक जाते हैं
अल्हड़ बचपन की गलियों में
गर खोल न पाये ख़ुशी उदासी की साँकड़
हम लुप्त हुये अलंकार में मोती कैसे सजायें