Tuesday, October 25, 2016

पिघलती शमा

तुम्हारे अहंकार को जिलाने के लिये----

मैं खड़ी हूँ सतत शिला की तरह
तुम्हारे अस्तित्व को बचाने के लिये

उठ गये मेरे कदम तो तुम
चार कदम भी न चल पाओगे
मिल गयी मंज़िल मुझे तो तुम
यूँ ही भटकाव में सिमट जाओगे

तुम्हारे दंभ को बहलाने के लिये----

मैं झुकी हूँ कमज़ोर डाल की तरह
तुम्हारे खोखलेपन को छुपाने के लिये

चल गयी चाल जो मैं तो तुम
एक बाज़ी भी न जीत पाओगे
हार कर सर्वस्व अपना
जीते जी ही मर जाओगे

हारी बाज़ी जिताने के लिये----

मैं बंद कर देती हूँ द्वार मस्तिष्क के
तुम्हारी आत्म-संतुष्टि दर्शाने के लिये
  
चख लिया स्वाभिमान मैंने तो तुम
झुकी नज़रें न उठा पाओगे
मेरी सहनशीलता के अलाव तले
अधपका ग़ुरूर ही चख पाओगे

तुम्हारी हठधर्मिता सहलाने के लिये----

मैं गटक लेती हूँ समस्त तेज़ाब
तुम्हारी कठोरता पिघलाने के लिये

छलका दिया जो मैंने तुम्हारी
चंचलता का पैमाना तो तुम
परिष्कृत समाज न झेल पाओगे
बूझ गये जो मेरे ह्रदय की पहेली
उम्र-भर रीते ही रह जाओगे

तुम्हारे प्रेम को फुसलाने के लिये----

अश्क़ मोती से तोल लेती हूँ मैं
रूह भस्म से सुलगा लेती हूँ मैं

परंपराओं का मूल्य चुकाने के लिये----

मैं तपी हूँ एक स्वर्ण की तरह
तुम्हारी जात चमकाने के लिये

Wednesday, October 12, 2016

मृग-मरीचिका

मत धुँधलाओ इन्हें
ये खुशफ़हमी के साये हैं
जो नज़र तो आते हैं मगर
पकड़ में नहीं आते

सदियों से मंडरा रहे हैं ये
पलकों की मुंडेर पे
कभी स्वप्न में मुस्कुराते हैं
कभी दर्द में सहम जाते हैं

कभी झाँकते हैं सूनी उदास
आँखों में
और कभी बनकर पलाश
अंतस की बगिया में
महक जाते हैं

कभी अस्तित्व को टाँग देते हैं
एक सूली पर
और कभी बनकर सुबह
तिमिर की छटपटाहट को
निगल जाते हैं

मैं बनकर पवन उड़ जाना चाहती हूँ
मगर तभी
ये चमका देते हैं नन्हें स्वप्न
और मैं उलीच कर संशय
ओक में भर लेती हूँ
अनिश्चित भविष्य

निहारती हूँ उसे एक मासूम
बच्चे की तरह
ह्रदय-पटल से पोंछकर अनिश्चिंताओं
की धूल
छुप जाती हूँ एक बदली की ओट में

मगर तभी फट जाते हैं बादल
और निष्ठुरता के ताप से
भीग जाता है व्यथित मन

और वो साया जिसे मैं समझ रही थी
उम्मीदों का खिवैया
खींच लेता है मुझे एक काली अंधेरी
गुफा में
मस्तिष्क के गणित को करके शून्य
लील लेता है वो भूत,भविष्य,वर्तमान
भूत,भविष्य,वर्तमान