Tuesday, December 3, 2019

रुला रही है प्याज
लग रहे हैं कयास
कैसे बने साग
गरीब की कुटिया मे
भूख का है सवाल
तृप्ति की है दरकार
कैसे बंधे आस
गरीब की कुटिया मे
गरीबी के दिन यूं ही
गुजर हो जाते थे
प्याज रोटी खाकर ही
बच्चे सो जाते थे
जिस दिन दाल-सब्जी
बन जाती थी
उस दिन आँखों मे
चमक आ जाती थी
हो गया इसका भी अवकाश
गरीब की कुटिया मे
मध्यम वर्ग भी अछूता नहीं
इस आफत से
मांग रहे हैं वो बढ़ी पगार
इस नयी मुसीबत से
भले ही हो
प्याज की मारामारी
मगर जेब हमारी ही
कटनी है बेचारी
रिक्शे वाला भी दाम
बढ़ाकर बोलेगा
हमारी जेब से अपनी
प्याज को तोलेगा
डूबेगा हमारा ही उजास
गरीब की कुटिया में
रुला रही है प्याज
लग रहे हैं कयास
गरीब की कुटिया मे
अमिता सिंह