Monday, February 20, 2017

थपेड़े

मेरे अंतस की कीमियों से
सच के साये गुजरते गये---
और झूठ की दहलीज़ पर
चराग़ मोहब्बत के जलते गये---

वो न बैठे ख़ामोश
न कोई हरक़त की
न पूछा हाल दिल का
बस रात के अलाव तले
जिस्म दो जलते रहे---

तड़प की राख से जब
रूह की बात चली
गुरूर के बादल फिर
जरूरतों के मोहताज़ तले
इठलाकर बरसते रहे---

झुक गयी बदली भी फिर
बादलों की ओट में
सर उठाने की इजाजत नहीं
सर छुपाने के दौर में
वफ़ा की कोपलों को
रसूखदार रौंदते गये---

मेरे अंतस की कीमियों से
सच के साये गुजरते गये---
और झूठ की दहलीज़ पर
चराग़ मोहब्बत के जलते गये---