Monday, April 11, 2016

लौ जलने दो

लौ  जलने  दो


नहीं चाहिये मुझको बापू
गुड्डे-गुड़िया और खिलौने
मुझको मेरे बापू पहना दो
अक्षर-ज्ञान के अद्भुत गहने
उस गहने की चमक से बापू
चमक जायेगा अज्ञानी आंगन
ज्ञान की गंगा में डूबकर
पार हो जायेगा अल्हड़ बचपन
और यौवन
पुस्तकों का संसार कौतूहल का
द्वार खोल जायेगा
सही-गलत का अंतर
ज्ञान का सागर
बूझ जायेगा
पढ़-लिखकर बापू मैं भी
नील-गगन पर चमकूंगी
समानता की लाठी से
बुढ़ापे का सहारा बनूँगी
बूझ अक्षरों की पहेली
अपना मुकद्दर आप गढूंगी
गलत धारणाओं को तोड़
उन्नति की नदिया में बहूंगी
ऊंच-नीच,अमीर-गरीब
जाँत-पाँत की खाई को
ज्ञान के भण्डार से भरूंगी
अंगूठे के ठप्पे के साथ मैं
अब न जिऊंगी 
कलम की नोक से एक नवीन
इतिहास रचूंगी
एक नवीन इतिहास रचूँगी