Sunday, February 7, 2016

हसरतें

कुछ सिमट आये ओस
शुष्क पलकों तले
कुछ टिमटिमाते जुगनू
मैं भी चाहती हूँ
कुछ बिखर जाये चांदनी
ख्वाहिशों के तले
कुछ दुआओं की सौगात
मैं भी चाहती हूँ
ज़िंदगी तेरे पन्नों की कसम
कुछ जुमलों पर दाद
मैं भी चाहती हूँ
न तुम बदलो,न जहाँ बदले
न रुत बदले,न समां बदले
ऐ खुदा, तेरी नेमतों की कसम
बस एक करवट मुक़द्दर
मैं भी चाहती हूँ
खारे पानी में घुल जाये
जो नदिया की तरह
एक बूंद अधरों पर वो बरसात
मैं भी चाहती हूँ
कुछ ठहर जाये वक़्त
मेरी भी ख़ातिर
एक क़तरा उम्मीद
मैं भी चाहती हूँ
ऐ, उजड़े चमन तुझसे
कोई शिक़वा ही नहीं
कुछ सूखे गुलाब
मैं भी चाहती हूँ
एक लहर मचले और
किनारे डूब जायें
कुछ सीपियों की पतवार
मैं भी चाहती हूँ
कुछ राज़ पिघलें और
पर्दे सरक जायें
ऐ, हकीक़त तेरी रोशनी की कसम
कुछ ख़तों की राख़
मैं भी चाहती हूँ
न नमी उछले,न बेचारगी खनके
न संस्कार छिटकेँ,न हौंसला बिखरे
ऐ मन, तेरी चेतना की कसम
वज़ूद की खैरात नहीं
बस खुद से खुद की पहचान
मैं भी चाहती हूँ
एक मुट्ठी आसमान
मैं भी चाहती हूँ